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पड़ोसी भाभी की चुदाई

हैल्लो दोस्तों, मेरा नाम राज है और में जयपुर के पास एक गाँव से हूँ। मुझे बहनों और चाचीओं में बहुत दिलचस्पी है। मैंने भाभी की चूत या किसी आंटी की चूत को चोदने का कोई मौका नहीं छोड़ा। आज मैं आपके सामने एक और सच्ची घटना लेकर आया हूँ। इससे पहले कि मैं कहानी को आगे बढ़ाऊं, मैं आपको अपने बारे में कुछ हल्की जानकारी देना चाहता हूं। मेरी उम्र 34 साल है और मेरा शरीर काफी फिट है। मैं रोजाना व्यायाम के लिए भी समय निकालता हूं। यह मेरी दिनचर्या का हिस्सा है। तो दोस्तों, यह दो साल पहले की बात है। उस समय मैं एक कंपनी के टेंडर के रूप में जयपुर गया था। मैं वहाँ किराये का कमरा लेकर रह रहा था। पास में एक खूबसूरत भाभी थी जो देखने में बहुत हॉट लगती थी। गर्म से मेरा मतलब यह नहीं है। हॉट एक महिला को अपना स्टाइल बनाता है, मेरा ऐसा मानना ​​है। वो भाभी भी मेरी तरह दिखने में थोड़ी मोटी थी। सूखी महिलाएं मुझे ज्यादा आकर्षित नहीं करती हैं। मैं थोड़ा स्वस्थ बहनों में ज्यादा दिलचस्पी रखता हूं। तो उस भाभी की उम्र करीब 37 साल थी। वह उससे कम दिखती थी। मुझे बाद में उम्र का पता चला, लेकिन मैं आपकी जानकारी के लिए यहां पहले ...

वासना की न खत्म होती आग




सम्भोग किसे नहीं पसंद? और अगर पसंद न होता तो न लोग यहाँ कहानियाँ पढ़ने आते न सुनाने… न मैं आती, न आप लोग!

मैं औरों के बारे में नहीं जानती पर जैसे जैसे मैंने सेक्स का आनन्द खुल कर लेना शुरू किया, मेरी इच्छाएँ और बढ़ती चली गई और फिर नई पसंद नया अनुभव…


मेरी पिछली कहानियों से तो आप पता ही चल गया कैसे मैंने सेक्स के नए नए अनुभवों को पाया।

पर पिछले सात महीनों में मैंने जो कुछ जाना और किया वो मेरी बाकी के अनुभवों से कहीं ज्यादा रोचक है क्योंकि यह मैंने स्वयं ही महसूस किया।

मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं ऐसा करूँगी या इतनी बदल भी जाऊँगी।


एक औरत जिसके आगे पीछे इतने पहरे होते हैं, वो इतना कुछ कैसे कर लेगी… यह भी शायद आप लोग यकीं न करो पर जो मैंने किया वो सच में रोचक था।


अब असल मुद्दे पे आती हूँ और आपको बताती हूँ ऐसा क्या किया मैंने जो इतनी उत्सुक हूँ खुद मैं आप सबको बताने के लिए!

दरअसल यहाँ झारखण्ड में बच्चों और परिवार के बीच फंसी सी थी, कभी अन्तर्वासना पर कहानियाँ पढ़ती तो कभी सेक्स वीडियो देखती समय बिताती, पर सही मायने में जीवन और सेक्स का मजा धीरे धीरे खत्म सा हो गया था।


दिल में कुछ अलग सी चाहत थी पर समझ नहीं आरहा था कि क्या है वो! कभी सम्भोग करने की तीव्र इच्छा भी होती तो अकेली थी और पति का होना, न होना बराबर ही है।

बस इसी बीच कभी कभार बंगलौर वाली सहेली तारा से बात करती थी और बड़े शहरों में क्या क्या हो रहा है, सुनती थी।

वो हमेशा मुझे बताती थी कि हर शनिवार और रविवार वो किस तरह की पार्टी और लोगों से मिलती जुलती और मजे करती थी।


पिछले साल होली से पहले की बात है, तारा और मैं एक दोपहर बातें कर रहें थे तभी उसने मुझे बताया कि वो आने वाले शनिवार को एक नए दोस्त से मिलने वाली है।

उसने बताया कि कैसे वो इन्टरनेट पे चाटिंग के जरिये उससे मिली और इस कदर दोनों खुल गए कि वो जर्मनी से मिलने भारत चला आया।


एक पल तो मुझे लगा कि वो बस लम्बी लम्बी डींग हाक रही है, पर जैसे ही शनिवार आया उसने मुझे उसके साथ एक फोटो भेजी।

अब तो शक करने का कोई सवाल ही नहीं था।


उस दिन की तस्वीर ने मुझे दिन भर बैचैन कर दिया। रात भर मैं बस सोचते हुए सोई कि मेरी सहेली तारा कैसे उस विदेशी के साथ होगी, क्या क्या कर रही होगी।

वैसे तो मैं उससे सुनती रहती थी कि वो हर शनिवार और रविवार कुछ अलग करती है। उसके बहुत सारे दोस्त हैं पर यह पहली बार हुआ कि लोग ऐसे भी मिलते हैं और उनकी बस एक इच्छा होती है सम्भोग और मजे करना अलग अलग तरीकों से।


मैं 3-4 दिन तक बस यही सोचती जब भी अकेली होती।


फिर एक दिन दोपहर को उसका फ़ोन आया, मैंने उत्सुकता भरे स्वर में उससे पूछना शुरू कर दिया- कैसा रहा, क्या हुआ, सारी बातें।

फिर उसने जो बताया वो सुन कर तो मैं चौंक गई पर दिल को थोड़ा धैर्य देते हुए उसकी बातें सुनने लगी।


वो शनिवार रात उस विदेशी के साथ तो थी ही थी पर अगले रविवार दो जोड़े ऑस्ट्रेलिया से आये और उनके साथ एक ही कमरे में सामूहिक सम्भोग किया।


मैं यह सुन कर अचंभित हुई पर जब उसने कहा कि उन सभी ने बारी बारी से एक दूसरे के साथ सम्भोग किया तो मैं और भी अचंभित हो गई। इसका मतलब था कि हर किसी ने तीन बार सम्भोग किया तीन अलग अलग मर्द और औरत के साथ।


उस दिन तो मैं बस बैचैन हो कर सोचती रही कि कैसे किसी अनजान के साथ इतना खुल कर सम्भोग कर सकता है कोई।

पर मेरे अन्दर अलग सी अन्तर्वासना जागने लगी थी।

बात सम्भोग की नहीं थी, जीवन में कुछ अलग करने की थी। तारा की बातों ने मुझे और भी उत्सुक कर दिया था।


अब मैं सेक्स वीडियो देखती तो थी पर हर वक़्त ‘कुछ अलग दिखे’ वो सोचती थी। मेरे अन्दर वासना की एक अलग भूख सी उमड़ने लगी थी कुछ अलग करने की, सम्भोग के अलावा कुछ और करने की।


मैं जब कभी अकेली होती तो अलग तरह के सेक्स वीडियो ढूंढने लगती। यहाँ तक कि जानवरों का सेक्स, गन्दी हरकतों वाली सेक्स जैसे गाली देना या पेशाब कर देना इत्यादि।


मैं ज्यादातर अपना समय या तो ब्लू फिल्में देख कर बिताती या कहानियाँ पढ़ कर्… जब अकेली होती।

पर सामूहिक, अदला बदली, लेस्बियन सेक्स, पेशाब करना, सौतेले माँ बेटे का सेक्स, योनि के अन्दर वीर्यपात… ये सब अच्छे लगने लगे थे और मेरे मन में भी ऐसा करने की कभी कभी इच्छा जगती।

पर धीरे धीरे इनसे मेरा मन उबने लगा था।


तभी एक दिन तारा से बात करते हुए एक एडल्ट साईट के बारे में पता चला मुझे जिसका नाम ***.कॉम है।

उसने मुझे बताया कि लोग वहाँ अपनी तरह के साथ चुनते हैं उनसे चाटिंग करते है, अपनी बातें एक दूसरे से कहते हैं और भी बहुत कुछ होता है।

उसने बताया कि जिस विदेशी से वो मिली और उसके बाकी के दोस्त भी सभी इसी साईट से मिले थे।


पहले तो मुझे बड़ी खुशी हुई कि चलो कुछ नया होगा जीवन में और मैंने रात को अपनी एक आईडी बना ली।

उस साईट पे जाते ही मैंने देखा कि करोड़ों लड़के लड़कियाँ, औरत मर्द हैं।

कुछ के तो ढेरो फोटो और वीडियो भी हैं।


फिर मेरे मन में ख्याल आया कि इतने लोगों में पता नहीं कौन अपनी जान पहचान का होगा और क्या पता मेरा भेद खुल जाए!

तो मैंने उसे बंद कर दिया।

पर फिर तारा ने मुझे बताया के अपना नाम, पता और फोटो मत डालो बस ऐसे ही चैट करो जो अच्छा लगे, कुछ मस्ती ऑनलाइन कर सकती हो।


मैंने वही किया जैसे ही मैंने अपनी आईडी खोली, देखा तो बहुत से मर्दों औरतों के messeges थे।

कुछ अपनी उम्र के तो कुछ बड़े और ज्यादातर छोटे।

मैं उन्हें पढ़ने लगी, कुछ के मैंने उत्तर भी दिए जो मुझे मेरी तरह के लगे।


अब मैं हर रोज जब मौका मिलता, ऑनलाइन आती और ढेरों लोगों से बातें करती, कुछ अच्छे मिलते कुछ बुरे!

जो मुझे अच्छे लगते, उनसे मैं रोज बातें करने लगी। इनमें से कुछ ने अपनी फोटो मुझे भेजी। जिनमें से एक आर्मी रिटायर्ड देहरादून के एक आदमी से दोस्ती हो गई मेरी अच्छी, हम रोज बातें करने लगे, एक दूसरे के जीवन के बारे में, एक दूसरे की इच्छाओं के बारे में।


मुझे उनमें यह बात अच्छी लगी कि बाकी लोगो की तरह वो हमेशा सेक्स की बातें नहीं करते थे।

फिर उन्होंने तीन महीने के बाद मुझसे मेरी फोटो मांगी।

पता नहीं शुरू में तो मैंने मना किया पर रात होते होते खुद ही भेज दी।


मेरी फोटो देखते ही उन्होंने मुझे messege किया- क्या यह सच में तुम हो?

मैंने जवाब दिया- हाँ।

उन्होंने कहा- तुम बहुत सुन्दर हो, लगती नहीं कि तुम 46 साल की हो?

मैंने कहा- तारीफ करने के लिए धन्यवाद पर मैं इतनी भी खूबसूरत नहीं हूँ।


उन्होंने कहा- चेहरे से लगता नहीं कि तुम्हारे तीन बच्चे हैं पर जिस्म से लगता है।

मैंने कहा- आप जिस्म देख कर पता लगा लेते हो कि किस औरत के कितने बच्चे हैं?

उन्होंने कहा- नहीं, तुमने बताया था कि तुम्हारे तीन बच्चे हैं तो ये फोटो देख कर यकीं हो ही जाता है कि तुम्हारे तीन बच्चे हैं।


बस इसी तरह बातें करते हुए पता नहीं चला कि कब चार बज गए रात के।


कुछ दिनों तक हम ऐसे ही बाते करते रहे। हम दोनों सेक्स के मामले में तो पहले ही खुल चुके थे और रात को ज्यादातर सेक्स की ही बातें करते थे।


फिर एक रात बातें करते हुए वो कुछ ही गर्म हो गए और कहने लगे- मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ।


मैंने शुरू में सोचा कि हो सकता है जोश में भावुक होकर वो ऐसा कह रहे हों।

पर उन्होंने मुझे कहा- क्या तुम मुझे कैमरे पर देखना चाहोगी अभी?

मैंने पूछा- यह कैसे संभव है?

उन्होंने मुझे एक आईडी भेजी और कहा कि इसे अपने कंप्यूटर पे खोलो।


मैं शुरू में तो हिचकिचाई कि इतनी रात को कंप्यूटर की लाइट जली देख किसी को भी शक हो सकता है तो मैंने मना किया।

फिर थोड़ी देर बाद मैंने खुद ही कंप्यूटर खोल आईडी खोली और उनको बता दिया।


तुरंत बाद मेरे कंप्यूटर पर एक संदेश आया कि इसे खोलो!

मैंने खोला तो देख कर दंग रह गई।

एक 59 साल का आदमी कच्छे और बनियान में बैठा था।


मैंने उनको पहचान तो लिया था पर फोटो में वो जवान दिख रहे थे और यहाँ बूढ़े।

पहले तो मेरी शंका दूर की उन्होंने कि फोटो भी असली थी और ये भी…

और मैंने भी बात मान ली क्योंकि मुझे कौन सी उनसे शादी करनी थी।


हम फिर वही सेक्स की बातें करने लगे और फिर उन्होंने अपना बनियान और कच्चा निकल दिया।

मैं एकदम से चौंक गई कि ‘हे भगवान्… यह आदमी नंगा हो गया।

वो थोड़ा घुटनों के बल बेड पे उठे तो सामने उनका तनतनाया हुआ लिंग था करीब सात इंच लम्बा और तीन इन्च मोटा।


लिंग की स्थिति देख समझ में आ गया था कि वो बहुत उत्तेजित है, तभी उन्होंने अपने लिंग को पकड़ा और ऊपर की चमड़ी को सरका के पीछे कर दी और उनका सुपाड़ा खुल के सामने आ गया।

इस स्तिथि में वो लिंग बहुत ही आकर्षक लग रहा था।

यह नजारा देख पता नहीं मेरी योनि में नमी सी होने लगी थी।


तभी उन्होंने कहा- ‘जब से तुम्हारी फोटो देखी है, तब मैं तुम्हें चोदने के सपने देखता हूँ।

उनका जिस्म और उम्र देख कर तो लगता नहीं था कि वो सम्भोग ज्यादा देर कर सकते हैं पर फिर मुझे अपने फूफाजी की बात याद आई।

उस रात उन्होंने हाथ से हिला के मुझे अपना वीर्य भी दिखाया कितना गाढ़ा और सफ़ेद था।

उसे देख मैं भी उत्तेजित सी हो गई थी।


पर मैं सोने चली गई बस उस लिंग को सोचते हुए क्योंकि रात काफी हो गई थी।


इसके बाद तो बाते होती रही और लगभग हर बार मुझे मिलने की बात कहते।

उनकी इन बातों से कभी कभी मेरे मन में भी ऐसे ख्याल आते पर यह सब संभव नहीं था, जानती थी सो ज्यादा धयान भी नहीं देती थी।

हम धीरे धीरे इतने घुलमिल गए कि हर 3-4 दिन में मैं उन्हें हस्तमैथुन करने में मदद करती और देखती उनको कंप्यूटर पे अपना रस निकलते हुए।

वो हमेशा तरह तरह की बातें करते मुझसे मुझे बताते कि किस तरह से वो कल्पना करते हैं मुझे चोदने और मैं भी कभी कभी उनकी कल्पनाओं में खो जाती।


फिर एक दिन वो कहने लगे कि हमें मिलना चाहिए और उनकी यह बात अब जिद सी बन गई।

पर मैं न तो अकेली कहीं जा सकती थी और न किसी से अकेली मिल सकती थी तो मेरे लिए मुमकिन नहीं था।

पर मुझे भी अपने अन्दर की वासना कमजोर बना देती पर किसी तरह मैं खुद को काबू करती थी।


तारा मुझसे हमेशा पूछती थी कि कोई मिला या नहीं? पर मैं उसे हमेशा कहती- हाँ, रोज कोई न कोई मिलता है, बातें कर के समय काट लेती हूँ।

पर उधर मेरा वो दोस्त मुझसे मिलने और सम्भोग के लिए इतना उत्सुक हो चुका था कि वो किसी भी हद तक जाने को तैयार था। मुझे वो रोज परेशान करने लगा तब मैंने यह बात तारा को बताई।


तारा ने मुझे पहले तो पूछा कि वो मुझे पसंद है या नहीं?

तो मैंने उसे हाँ कह दिया तब उसने कहा- अगर पसंद है तो मिल लो।

उसने कहा- अगर मिलना चाहती हो तो तय कर लो, बाकी तेरे घर से निकलने और मिलने का इन्तजाम मैं कर दूँगी।

अब ये सब बातें सुन कर तो मैं हैरान हो गई और दोनों से लगभग दो हफ़्ते बात नहीं की।


पर मेरे अन्दर की वासना से मैं ज्यादा दिन बच न सकी और एक दिन तारा से पूछ लिया कि क्या वो ऐसा कर सकती है कि हम मिल सकें और सब कुछ सुरक्षित तरीके से बिना किसी के शक कहीं मिल सकें?


उसने मुझे फिर समझाया कि अगर मैं तैयार हूँ तो वो मेरे लिए सारा इन्तजाम कर देगी। मुझे तो उस पर पूरा भरोसा था, मैंने उस दोस्त को सन्देश भेज दिया कि मैं मिलना चाहती हूँ।

उसी रात हमने फिर बातें की और उनसे कह दिया कि जब मुझे मौका मिलेगा, मैं उन्हें बुला लूँगी।


इधर तारा को सारी बात मैंने बता दी। उसने कहा कि अगले हफ्ते का दिन तय कर लो, मैं झारखण्ड आऊँगी और सब इंतज़ाम कर दूंगी।

मैंने अपने दोस्त को भी फ़ोन कर के अगले हफ्ते आने को कह दिया।


अगले हफ्ते बुधवार को तारा हमारे गाँव आ गई और शाम को मुझसे मिली। हमने तय किया कि अगले दिन हम शहर जायेंगे।

मेरे घर वाले तारा के साथ कहीं आने जाने से रोकते टोकते नहीं थे तो मुझे कोई चिंता नहीं थी, बस शाम को अँधेरा होने से पहले मुझे घर लौटना था।


अगले दिन हम सुबह 8 बजे घर से निकल गए और करीब नौ बजे शहर पहुँच गए। रास्ते भर मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था यह सोच कर कि क्या होगा ऐसे किसी इंसान के साथ जिससे मैं पहले कभी मिली नहीं।

मुझे अभी तक नहीं पता था कि तारा ने क्या इंतज़ाम कर रखा है।


पहले तो वो मुझे एक होटल में ले गई, पर मुझे बहुत डर लगा, मैंने इन्कार कर दिया।

फिर उसने बताया कि वो इसी होटल में है और हम अलग कमरा लेंगे।

हम वह अन्दर गए और हमने कमरा ले लिया यह कहकर कि तबियत ख़राब है, थोड़ा फ्रेश होने के लिए कुछ देर के लिए चाहिए कमरा।

दो औरत 40 बरस के ऊपर, सोच उनको ज्यादा परेशानी नहीं हुई और हम कमरे में चले गए।


कमरे में जाते ही तारा ने मुझे कहा कि उसको फ़ोन कर बुला लो हमारे कमरे में!

मैंने थोड़ा हिचकते हुए फ़ोन किया और उन्हें हमारे कमरे में आने को कहा।


10 मिनट के बाद दरवाजा खटखटाने की आवाज आई, तारा ने दरवाजा खोला तो सामने एक लम्बा सा 60 साल का मर्द खड़ा था।

उसने अपनी पहचान बताई और तारा ने उसे अन्दर बुला लिया।

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वो मुझे देख कर मुस्कुराया और मैं भी दिल के धड़कनों को काबू में करते हुए मुस्कुरा दी।

हम बेड पर बैठ कर बातें करने लगे, मैंने उस दोस्त को बस यही बताया था कि तारा मेरी सबसे अच्छी दोस्त है और उसको बस इतना बताया है कि वो मुझे प्यार करता है और मिलना चाहता था।


बाकी असल बात क्या है मेरे और तारा के बीच थी और उनके और मेरे बीच।


मैंने उनको देखा.. वो चेहरे से कुछ ज्यादा उम्रदराज नहीं लग रहे थे। उनका बदन भी इतना सुडौल था कि कोई भी एक नजर में कह सकता था कि ये फ़ौज के बड़े अफसर होंगे।


मैंने गौर किया कि उनके चेहरे और आँखों में एक रौनक थी.. ऐसा जैसा कि वो मुझे देख कर कितने खुश हैं।

हम तीनों आपस में बात करने लगे.. पहले तो कुछ देर जान-पहचान हुई।


फिर तारा ने ज्यादा समय नहीं लिया और उनसे उनके कमरे की चाभी मांग कर हमें बोली- आप लोग आपस में बातें करो.. मैं कवाब में हड्डी नहीं बनना चाहती।


वो मुस्कुराते हुए वहाँ से चली गई।


मैं थोड़ी शरमाई सी थी.. पर घबराहट ज्यादा थी.. क्योंकि मैं उनसे पहली बार मिल रही थी और सब कुछ करने की हामी भी भर दी थी।


उन्होंने बातचीत शुरू की.. मैंने भी उनके सवालों के जवाब देने शुरू किए। पहले तो हम अपने घर-परिवार और बच्चों की बातें करने लगे।


फिर धीरे-धीरे एक-दूसरे के बारे में और फिर पसंद-नापसंद और फिर पता ही नहीं चला.. कि कब हम ऐसे घुल-मिल गए.. जैसे हम पहली बार नहीं मिल रहे हों।


अजीब सा जादू था उनके बात करने के अंदाज में..

हमें बातें करते हुए एक घंटा हो चुका था और मेरे दिमाग और दिल से अब अनजानेपन की बात भी निकल चुकी थी।


फिर मैंने उनसे कहा- मैं बाथरूम होकर आती हूँ।

मैं बाथरूम गई और पेशाब कर वापस आकर उनके बगल में दुबारा बैठ गई।


मेरे आने के कुछ देर बाद उन्हें भी पेशाब करने की सूझी.. तो वो भी कर आए और आकर मेरे बिल्कुल करीब बैठ गए।

मुझे उनका हल्का सा स्पर्श हुआ और मेरा दिल जोर से ‘धक्क’ किया..। नाभि के पास एक अजीब सी गुदगुदाहट शुरू हुई और ऐसा लगा जैसे मेरी योनि में जाकर खत्म हो गई।


उन्होंने फिर मुझसे कहा- कितने समय रुकोगी यहाँ?

ये कहते हुए उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।


मैं घबरा सी गई और पता नहीं मेरे मुँह से ऐसा क्यों निकल गया कि जल्दी कर लो.. मुझे शाम तक जाना है।


इतना सुनने की देर थी कि उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और मेरे चेहरे को एक हाथ से ऊपर उठा के बोला- मुझे लगता है.. जैसे मुझे तुमसे प्यार हो गया और तुम्हें पा लेना चाहता हूँ।

उन्होंने बड़े प्यार से मेरे होंठों को चूम लिया।

उनके होंठों का अपने होंठों पर स्पर्श मिलते ही मैंने उन्हें कस कर पकड़ लिया और मेरी आँखें बंद हो गईं।


उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों से अलग किए.. तो मेरी आँखें खुल गईं और उनसे नजरें मिल गईं.. मुझे उनकी आहों में आग सी दिखाई दी।


मैं झटके से उनके सीने में अपना चेहरा छिपाते हुए उन्हें और जोर से पकड़ते हुए चिपक गई।

हम बिस्तर पर ही बैठे एक-दूसरे से चिपके हुए थे।


जब उन्होंने देखा कि मैं उनसे अलग नहीं हो रही हैं.. तो उन्होंने अपना एक हाथ मेरी जाँघों को पकड़ते हुए मुझे बिस्तर पर घसीटते हुए बीचों-बीच ले आए और फिर उसी हालत में मुझे लिटा दिया।

मैं उन्हें अभी भी पकड़े हुए थी। उन्होंने करवट ली.. मैं पीठ के बल हो गई और वो मेरे ऊपर हो गए।


उन्होंने मेरी तारीफ़ करते हुए कहा- तुम सच में सुन्दरता की मूरत हो।

बस ये कहते ही उन्होंने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और मुझे चूमने लगे।


कुछ समय के बाद उन्होंने मेरे पूरे चेहरे और गर्दन में चुम्बनों की बरसात सी शुरू कर दी और मेरे मुँह से बस लम्बी-लम्बी साँसों की आवाजें निकल रही थीं।

मेरे बदन में कंपकंपी सी शुरू होने लगी थी। मैं भी थोड़ी उत्तेज्जित हो रही थी।


उन्होंने मेरे होंठों को चूसना शुरू कर दिया.. साथ ही अपने हाथों से मेरी साड़ी ऊपर उठाने की कोशिश भी और मेरी नंगी जाँघों पर हाथों को फेरने भी लगे थे।

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उनकी जुबान बाहर आ गई और मुझे ऐसा लगा कि जैसे वो अपनी जुबान से मेरे मुँह के अन्दर कुछ ढूँढ़ रहे हों.. मैंने भी अपनी जुबान निकाल दी।

फिर क्या था.. वो मेरी जुबान से अपनी जुबान लड़ाने और चूसने लगे और मैंने भी उनका साथ देना शुरू कर दिया।


हम करीब 10 मिनट ऐसे ही एक-दूसरे को प्यार करते रहे। फिर वो मेरे ऊपर से हटे और मेरी साड़ी को उतारने लगे। मैं भी जानती थी कि वे ये सब क्या कर रहे हैं.. सो मैंने कोई विरोध न करके.. उन्हें सहयोग देने लगी।


मैं अब पेटीकोट और ब्लाउज में आ चुकी थी.. उन्होंने एक झलक मुझे ऊपर से नीचे घूर के देखा और मेरी भरे हुए स्तनों को दोनों हाथों से दबाते हुए मेरे ऊपर झुक कर मुझे फिर से चूमने और चूसने लगे।


अब मैं भी खुल चुकी थी और गर्म होने लगी थी.. सो मैं उन्हें बार-बार जोर से पकड़ती.. छोड़ती और उन्हें पूरा सहयोग देने लगी।


थोड़ी देर यूँ ही मुझे ऊपर से नीचे तक चूमने के बाद वो मुझे अलग होकर अपने कपड़े उतारने लगे।

उन्होंने पूरे कपड़े उतार दिए बस चड्डी को रहने दिया।

उनका बदन तो कुछ खास आकर्षक नहीं था.. क्योंकि वो काफी उम्रदराज थे।


फिर मेरे ब्लाउज के हुक खोलने लगे और ब्लाउज भी निकाल दिया। अब मैं सिर्फ ब्रा में थी और मेरा पेटीकोट भी जाँघों से ऊपर था। इस हालत में देख मुझे उनमें वासना की एक आग सी दिखी।


वो भूखे शेर की तरह मेरे ऊपर टूट पड़े और जहाँ-तहाँ मुझे चूमने लगे। उनके चुम्बनों की बारिश से मैं तड़प गई और मैंने फिर से उन्हें कस के पकड़ लिया।


उन्होंने चूमते हुए अपना हाथ मेरी पीठ पर ले जाकर मेरी ब्रा के हुक खोल दिए और झट से उसे निकाल दिया.. और थोड़ा उठ कर मेरे नग्न स्तनों को ललचाई निगाहों से घूरने लगे।

ऐसा लग रहा था जैसे मेरे भरे-भरे मांसल स्तनों जैसी कोई चीज़ पहले उन्होंने कभी देखी ही नहीं थी।


फिर अचानक से एक झटके में उन्होंने मेरे एक स्तन को हाथ से पकड़ा और उसे मसलते हुए अपना मुँह मेरे दूसरे स्तन पर लगा कर चूचुक को ऐसे चूसने लगे.. जैसे कोई बच्चा दूध पीता है।


मैं सहमी सी उनके इस तरह के व्यवहार को अपने अन्दर महसूस करते हुए मजे लेने लगी। कभी मेरे चूचुक को वो होंठों से भींच कर खींचते तो कभी दांतों से कुतरते।


इसी तरह उन्होंने मेरे दूसरे स्तन को पीना शुरू कर दिया और पहले वाले स्तन को हाथों से दबाने और सहलाने लगे।

मेरी योनि उनकी इन हरकतों से गीली होनी शुरू हो चुकी थी.. पर मैं कोई खुद से कदम उठा नहीं रही थी.. बस उनका साथ दे रही थी।


उन्होंने जी भर के मेरा स्तनपान करने के बाद मेरे पेट को चूमते हुए नीचे मेरी योनि के ऊपर अपना मुख रख दिया और ऊपर से रगड़ते हुए पेटीकोट का नाड़ा खोल कर पेटीकोट को नीचे सरका दिया।


अब मैं सिर्फ पैन्टी में थी और उन्होंने एक बार अपना सर ऊपर उठा कर मेरी पैन्टी की ओर देखा.. शायद उन्हें मेरी मॉडर्न तरह की पैन्टी देख कर ये अचम्भा सा लगा होगा।


क्योंकि मैं अमर की दी हुई पैन्टी के बाद ऐसी ही पैन्टी पहनने लगी थी पतली स्ट्रिंग वाली।


उन्होंने तुरंत फिर मेरी पैन्टी के ऊपर से योनि.. जो फूली हुई दिख रही थी उस पर हाथ फेरते हुए होंठों से चूम लिया और सहलाते हुए मेरी पैन्टी को किनारे सरका कर मेरी योनि खोल दी और उसे चूम लिया।


मैं एकदम से सिहर गई और ऐसा लगा.. जैसे पेशाब की पतली सी तेज़ धार निकल गई हो.. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं था.. बस वो मेरे जिस्म की एक सनसनाहट थी।


मैंने उनके सर को छोड़ कर खुद अपनी पैन्टी को पकड़ा.. तो उन्होंने मेरे हाथों को पकड़ते हुए मेरी पैन्टी को खींचते हुए मेरी पैन्टी निकाल कर मुझे पूर्ण रूप से नंगा कर दिया।


अब तो मेरे शरीर पर एक धागा भी नहीं था। मेरा पूरा नंगा जिस्म उनके सामने दिन के उजाले में था.. क्योंकि कमरे में बल्ब बुझाने के बाद भी दो तरफ से सूरज की रोशनी आ रही थी।


कमरे का नज़ारा भी बहुत सुन्दर था। कमरा बड़ा नहीं था.. पर साफ़ और सही था.. परदे खुले थे.. पर इस तरह से था कि खिड़कियाँ खुली होने के बाद भी कोई अन्दर देख नहीं सकता था।


अब उन्होंने अपनी जगह बदली और मेरे करीब आकर घुटनों के बल बैठ गए। फिर मेरी टाँगों को फैलाते हुए हुए मेरी और मुस्कुराते हुए देखा। मैंने भी शरमाते हुए उन्हें देख कर अपनी निगाहें छुपा लीं।


उन्होंने मेरी योनि के बालों पर हाथ फेरते हुए बालों को मेरी योनि के छेद से अलग किया और झुक कर अपना मुँह मेरी योनि के पास रख दिया।

मैं समझ गई कि वो मेरी योनि को चाटने वाले हैं, मेरी जाँघों की नसें सिकुड़ने लगीं.. योनि भी फड़फड़ाने लगी।


तभी उन्होंने कहा- क्या तुम बुर को साफ़ नहीं करतीं?

मैं सहमते हुए बोली- रोज तो धोती हूँ.. यहाँ तक कि पेशाब करने के बाद भी पानी से धोती हूँ।

इस पर वो मुस्कुराए.. उनके कहने का मतलब बाल सफाई से था.. पर मैं कुछ और समझ गई।


पर जो भी हो.. उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरी योनि के दोनों होंठों को दोनों हाथों की उंगलियों से फैला कर छेद को चूम लिया.. ऐसा लगा जैसे एक बिजली का झटका मेरी योनि से होता हुआ मेरे दिमाग में चला गया।

फिर क्या था.. मेरी योनि के छेद पर उन्होंने अपनी जुबान फिराई और चाटने की प्रक्रिया शुरू कर दी।


कुछ मिनटों के बाद मेरी योनि के छेद को उंगलियों से और फैला कर उसमें अपना थूक डाल दिया और फिर चाटने लगे। ऐसा लगा.. मानो मेरी योनि को पूर्ण रूप से गीला और चिपचिपा कर देना चाहते हों।

मेरी योनि तो शुरू से ही गीली थी.. पर मैं पता नहीं क्यों उनके अंदाज को मस्ती से ले रही थी।

काफी देर उनके चाटने और चूसने से मुझे अहसास होने लगा जैसे अब मैं झड़ जाऊँगी और हुआ भी यही।


इससे पहले कि मैं खुद को काबू कर पाती.. मैं अपनी एड़ियों को बिस्तर पर दबाती और जाँघों को उनके सर पर भींचने लगी। मैं इस वक्त लम्बी सांस खींचती.. होंठों को दबाती.. सिसकारी लेते हुए उनके बालों को कस के खींचते हुए अपनी व्याकुलता दिखा रही थी, तभी मैं अपनी कमर उनके मुँह में उठाते हुए.. हल्की पतली सी पानी की धार छोड़ते हुए झड़ गई।


अब मैं लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए अपनी कमर दोबारा बिस्तर पर रख कर उनके मुँह को अपनी योनि से अलग करने का प्रयास करने लगी।

कुछ पलों के बाद उन्होंने मेरी योनि से अपना मुँह अलग किया और योनि से लेकर नाभि.. पेट को चूमते हुए मेरे स्तनों को पकड़ चूसने लगे।


मेरा हाथ भी अब नीचे उनकी चड्डी के पास चला गया और ऊपर से ही उनके लिंग को मैं सहलाने लगी।

वो मेरे स्तनों को बारी-बारी से दोनों हाथों से जोर-जोर मसलने और चूसने लगे। मैं हल्के हल्के स्वर में कराहती हुई उनके लिंग को चड्डी के ऊपर से मसलने में मग्न हो गई।


कुछ देर बाद मैंने उनकी चड्डी को सरकाना शुरू कर दिया और जाँघों तक सरका कर लिंग बाहर निकाल कर हाथों से पकड़ा.. तो ऐसा लगा मानो ये आज मेरी जान ले लेगा।


जैसा मैंने कंप्यूटर पर देखा था.. वैसा ही मोटा और तगड़ा लग रहा था.. मानो कोई 40 साल का मर्द का लिंग हो.. एकदम तना हुआ मोटा और गर्म..

मैं हाथों से उसे हिलाने लगी.. तो लिंग का सुपाड़ा खुल कर बाहर आ गया।


तभी उन्होंने एक हाथ मेरे बाएं स्तन से हटाया और मेरे कूल्हे पर ले जाकर रख दिया और जोर से मसलते हुए करवट ली, हम दोनों अब एक-दूसरे के आमने-सामने थे।


वो मेरे चूतड़ों को सहलाते और दबाते हुए अब मेरे होंठों का रसपान करने लगे। मैं भी उनकी जुबान से जुबान और होंठों से होंठों को लड़ाते हुए हुए चूमने और चूसने लगी।


ऊपर हम मुँह से मुँह लगा एक-दूसरे को चूमने-चूसने और चाटने में व्यस्त थे.. नीचे हमारे हाथ एक-दूसरे के जननागों को मसल रहे थे। वो बहुत उत्तेजित हो गए थे और उन्होंने मेरी दाईं टांग उठा कर अपनी टाँगों के ऊपर रख ली। अब वे मेरे चूतड़ों को मसलते.. तो कभी मेरी मोटी जाँघों को सहलाते.. तो कभी अपने लिंग को मेरे हाथों से पकड़ने के बाद भी मेरी योनि के ऊपर दबाते।


काफी देर बाद उन्होंने मुझे चूमना बंद करके मेरे सर को पकड़ कर नीचे किया और झुकते हुए खुद ऊपर उठने लगे।

मैं समझ गई कि लिंग को चूसने का इशारा था।


मैंने नीचे की तरफ सरकते हुए उनकी चड्डी को निकाल कर उन्हें नंगा कर दिया। वो पीठ के बल लेट गए.. मैं उठ कर बैठ गई और लिंग को हाथ से पकड़ ऊपर-नीचे किया.. तो उनका सुपारा खुल और बंद होने लगा।


तभी उन्होंने मेरे सर को पकड़ा और मैं झुक कर उनके सुपारे को बाहर करके ऊपर अपनी जुबान फिरा कर उसे थूक से गीला कर दिया, फिर अपना मुँह खोल धीरे-धीरे लिंग को मुँह में समा लिया।


मेरे ऐसा करते ही वो सिसकारी लेने लगे और मेरे सर को पकड़ सहलाने लगे। मैंने करीब 3-4 मिनट चूसा और लिंग थूक से पूरा भीग गया।

तभी उन्होंने मुझे खींच कर अपने ऊपर लिटा लिया और फिर से हमारे होंठ एक-दूसरे के होंठों से खेलने लगे।


मैंने उनके सर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और चूमने लगी। उन्होंने अपने दोनों हाथों को मेरे पीछे ले जाकर मेरे पीठ को सहलाते हुए चूतड़ों को मसलते हुए जाँघों को फैला दिया।


अब मैं उनके ऊपर दोनों टाँगें फैला कर लेट गई। मैं उन्हें लगातार चूम रही थी। वो नीचे से अपनी कमर उठा कर लिंग को मेरी योनि में ऊपर से रगड़ रहे थे और मैं ऊपर से जोर लगा योनि को लिंग पर रगड़वा रही थी।


कुछ देर के बाद इसी अवस्था में चूमते हुए हम उठे और उन्होंने मेरे कूल्हों को पकड़ते हुए मुझे बिस्तर पर लिटा दिया और मेरे ऊपर आ गए।


मुझे उनके लिंग का स्पर्श योनि पर बहुत सुखद लग रहा था। वो घुटनों के बल मेरी टाँगों के बीच बैठ गए। फिर लिंग को हाथ से पकड़ कर मेरी योनि की दरार के बीच ऊपर-नीचे सुपाड़े को रगड़ा।


फिर योनि के छेद पर लिंग को टिका कर मेरे ऊपर झुकते हुए मेरे एक चूचुक को होंठों में दबाते हुए लिंग को योनि में घुसाने की कोशिश करने लगे।


मैंने भी उनके सर को जोर से पकड़ा और नीचे से कमर उठाने लगी। मुझे महसूस होने लगा कि लिंग धीरे-धीरे मेरी योनि में घुस रहा और फिर मेरी साँसों के साथ मेरी सिसकियाँ घुलने लगीं।


लिंग लगभग आधा घुस चुका था.. तब उन्होंने अपना हाथ लिंग से हटा लिया और मेरे कूल्हों पर ले जाकर पकड़ लिया और ऊपर उठाने लगे।

कुछ ही पलों के जोर और ताकत के कारण उनका मोटा लिंग मेरी योनि में समा गया और दोनों की सिसकी साथ-साथ निकलने लगी।


कुछ देर हम यूँ ही लिंग और योनि को अपनी-अपनी कमर हिला-डुला कर सही स्थिति में ले आए।

फिर उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे कंधों को नीचे से पकड़ लिया और मैंने उनको गले से जकड़ लिया और हम दोनों होंठों को होंठों से मिला कर चूमने लगे। धीरे-धीरे हम दोनों के नीचे के अंग भी हिलने लगे।


मैंने अपनी टाँगों को उठा कर उनकी जाँघों के ऊपर रख दिया और अब वो मुझे चूमते हुए अपने लिंग को मेरी योनि के अन्दर धकेलने लगे।

मुझे बहुत मज़ा आने लगा था और उनको भी..


तभी तो कुछ पलों के बाद उनकी गति तेज़ होने लगी और एक मर्दाना ताकत का एहसास मुझे होने लगा। करीब 7-8 मिनट होते-होते झटकों में काफी तेज़ी के साथ-साथ जोर भी आने लगा और मेरी सिसकारियों में भी तेजी आ गई, उनके हर झटके पर मैं कुहक सी जाती और ऐसा लगता ही नहीं कि ये इतनी उम्र के मर्द हैं।


काफी देर के बाद उनके झटके रुक-रुक के और धीमी हो कर लगने लगे.. पर हर झटके पर मुझे मेरी बच्चेदानी में चोट का असर दिखता.. जिससे मुझे और भी मजा आता और मैं कभी-कभी उनको कस कर पकड़ कर जाँघों से उन्हें भींचती और कराहते हुए अपनी कमर ऊपर उठा देती और योनि को लिंग पर दबाने लगती।


हम दोनों वासना के सागर में डूब चुके थे और मस्ती में खो गए थे।


करीब 15 मिनट हम इसी तरह एक-दूसरे की नजरों से नज़रें मिलाए हुए सम्भोग करते रहे पर अब मुझे महसूस होने लगा था कि वो थक चुके हैं, उनके धक्कों में ढीलापन आ गया था।

वो पसीने-पसीने हो गए थे और साँसें भी लम्बी-लम्बी ले रहे थे, इधर मेरे जिस्म की आग इतनी तेज़ हो गई थी कि मुझे बस तेज़ धक्कों की इच्छा हो रही थी।


मैंने जोर देकर उन्हें इशारा किया.. पर वो मेरे ऊपर से उठ गए और बगल में लेट गए।

मैंने उनसे पूछा- क्या हो गया आपका?

तब वो बोले- नहीं, अब तुम ऊपर आ जाओ और चुदो..


मैंने देखा उनका लिंग भीग कर चमक रहा था और बार-बार तनतना रहा था। इधर जब मैंने अपनी योनि की तरफ देखा तो योनि के किनारों पर सफ़ेद झाग सा था और योनि के बालों पर हम दोनों का पसीना और पानी लग कर चिपचिपा सा हो गया था।

मैंने तुरंत बगल में पड़े तौलिये से अपनी योनि को साफ़ किया और उनके ऊपर अपनी टाँगें फैला कर बैठ गई।


मैंने एक हाथ से योनि को फ़ैलाने की कोशिश की.. और दूसरे हाथ से लिंग को पकड़ सीधा कर योनि के छेद पर रास्ता दिखाते हुए कमर नीचे दबाने लगी।


मेरी योनि भीतर से इतनी गीली हो चुकी थी कि बस लिंग को छेद पर टिकाने की देरी थी। मैंने जैसे ही अपनी कमर उनके ऊपर दबाई.. लिंग सटाक से मेरी योनि की दीवारों को चीरता हुआ अन्दर समा गया।

मैंने अपने घुटनों को बिस्तर पर सहारा दिया और अपनी कमर का पूरा वजन उनके लिंग पर रख उनके ऊपर झुक कर.. अपने स्तनों को उनके मुँह में दे दिया।


वो मेरे स्तनों को चूसने-काटने लगे और मैं मछली की तरह मचलती हुई कमर हिला कर लिंग को अपने अन्दर-बाहर करने लगी।

मैं तेज़ी से धक्के दे रही थी और सिसकार भी रही ही..

उधर वो एक हाथ से मेरे स्तन को मसल-मसल कर पी रहे थे और दूसरे हाथ से मेरे चूतड़ों को दबाते और सहलाते हुए सम्भोग का मजा ले रहे थे।


जब-जब मैं धक्के लगाती.. मुझे मेरी योनि के भीतर उनके सुपारे के खुलने और बंद होने का सा महसूस हो रहा था।

मैं करीब दस मिनट तक धक्के लगाती रही और मुझे भी थकान सी होने लगी थी, मेरे धक्कों की गति धीमी होने लगी थी और जाँघों में अकड़न सी महसूस होने लगी थी.. पर मन में बस चरम सुख ही था.. तो मैं धीरे-धीरे धक्के लगाती रही..


पर बीच-बीच में उनके झटके मुझे नीचे से भी मिलते.. जो इतने तेज़ होते कि मेरे मुँह से सिसकारी के साथ निकलता- प्लीज धीरे..

वो झटके मेरी बच्चेदानी में लिंग की मार होते थे।

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मैं थकने के साथ-साथ झड़ने के करीब ही थी.. पर उनकी स्थिति देख कर लग रहा था.. जैसे अभी उन्हें काफी समय लगेगा।

उन्होंने मुझे उठने का इशारा किया, मैं उठ कर बिस्तर पर बैठ गई।

फिर वो भी उठ कर बैठ गए और मुझे घुटनों के बल आगे की तरफ झुका दिया, मैं अपने हाथों और घुटनों के बल झुक गई.. जैसे कुतिया होती है।


वो मेरे पीछे गए और मेरे बड़े-बड़े मांसल चूतड़ों को हाथों से सहलाने और दाबते हुए चूमने लगे, बोले- कितने मस्त चूतड़ हैं तुम्हारे..

फिर घुटनों के बल खड़े होकर उन्होंने मेरी योनि में लिंग घुसा दिया।


मैं तो उनकी तारीफ़ सुनी-अनसुनी करती.. बस लिंग को अपनी योनि में चाहती थी.. सो बस अपनी गाण्ड हिलाते हुए मजे लेने लगी।

कुछ ही देर में वो इतनी तेज़ी और जोरों से धक्के मारने लगे कि मुझे लगा कि अब तो मैं गई ‘आह्ह्ह्ह ऊउईइ ओह्ह्ह्ह’ करती हुई मैं बिस्तर पर गिरने लगी।

मेरी योनि की नसें सिकुड़ने लगी थीं मेरे हाथों और टाँगों की मांसपेशियां अकड़ने लगी थीं..


तभी उन्होंने सामने रखे दोनों तकियों को मेरी योनि के नीचे रख दिया और मैं पूरी तरह से बिस्तर पर लेट गई, मेरे साथ-साथ मेरे ऊपर अपने लिंग को मेरी योनि में दबाते हुए वो भी मुझ पर गिर गए थे।

मेरी साँसें तेज़ हो गई थीं.. मेरे मुख से मादक आवाजें निकल रही थीं और उनके झटकों के थपेड़े मेरे कूल्हों पर पड़ रहे थे।


मैंने अपनी योनि को भींचना शुरू कर दिया था.. मुझे लगने लगा था कि रस का फव्वारा मेरी नाभि से छूट रहा है.. जो योनि के रास्ते निकलने वाला है।

मैंने बिस्तर के चादर को जोर से पकड़ लिया.. अपनी गाण्ड को जोरों से हिलाने लगी… योनि को भींचते हुए झड़ने लगी और मेरे मुँह से निकलने लगा- प्लीज रुको मत.. चोदते रहो प्लीज.. और तेज़ और तेज़.. अह्ह्ह ईह्ह्ह्ह ओह्ह्ह.. हायय और तेज़ और तेज़..।


मेरी ऐसी हालत देख वो और तेज़ी से धक्के मारने लगे।

मैं उनके हर वार को अपनी योनि में महसूस करने लगी और मुझे सच में बहुत मजा आने लगा था।


फिर तभी मेरी योनि जैसे सख्त हो गई और योनि से पेशाब की धार निकलेगी… ऐसा लगा। मैंने अपनी गाण्ड उठा दी.. साँसें मेरी रुक सी गईं.. मैंने योनि को सिकोड़ दिया और पानी छोड़ते हुए झड़ गई।


इधर मैं अपनी साँसों को काबू करने में लगी थी.. उधर वो मुझे धक्के पर धक्के दे कर संभोग किए जा रहे थे।

मैं अपने जिस्म को ढीला करने लगी थी.. पर वो अभी भी धक्के लगा रहे थे और मेरे मुँह से कराहने की आवाजें कम नहीं हो रही थीं।

करीब 4-5 मिनट धक्के लगाने के बाद उनका लिंग मेरी योनि में पहले से भी ज्यादा सख्त और गरम लगने लगा।


मैं समझ गई कि अब वो झड़ने वाले हैं पर मैं नहीं चाहती थी कि उनका रस मेरी योनि में गिरे.. तो मैंने तुरंत उन्हें हटाने की कोशिश की.. पर उन्होंने एक हाथ से मेरा सर जोर से बिस्तर पर दबा दिया और एक हाथ से कंधे को रोक सा दिया।


मैं ‘नहीं नहीं’ करती ही रही कि उनके जोरदार 8-10 धक्कों के साथ पिचकारी की तेज़ धार मेरी योनि के भीतर महसूस हुई।

वो झड़ते हुए और हाँफते हुए मेरी पीठ के ऊपर निढाल हो गए।

मैं समझ गई कि मेरी कोशिश बेकार गई.. और उन्होंने अपना बीज मेरे भीतर बो दिया.. सो अब कोई फ़ायदा नहीं..


उनकी आँखें बंद थीं और धीरे-धीरे उनका लिंग मेरी योनि के भीतर सिकुड़ कर अपनी सामान्य स्थिति में आ गया।

हम दोनों कुछ देर यूँ ही पड़े रहे.. फिर मैंने उन्हें अपने ऊपर से हटने को कहा।


वो जैसे ही हटे.. मैंने देखा तकिया पूरी तरह से भीग गया था। उनका सफ़ेद और गाढ़ा रस मेरी योनि से बह कर बाहर आने लगा..


मैं जमीन पर खड़ी हुई और तुरंत बाथरूम गई। वहाँ से खुद को साफ़ करके वापस आई.. तो देखा कि दो बज चुके हैं। हमें अपनी काम-क्रीड़ा में इसका पता ही नहीं चला।


वो अभी भी नंगे बिस्तर पर सुस्ता रहे थे, मैंने कहा- मुझे जाना होगा..

और मैं अपने कपड़े समेटने लगी।

मैं जैसे ही अपनी पैन्टी लेने बिस्तर के करीब गई.. उन्होंने मुझे फिर से पकड़ लिया और बिस्तर पर खींचने लगे।


अब मैं विनती करने लगी- बहुत देर हो जाएगी सो मुझे छोड़ दें..

पर उन्होंने अपनी ताकत लगाते हुए मुझे अपने करीब लेकर मुझे सीने से चिपका लिया और बिस्तर से उठ खड़े हो गए।

उन्होंने मुझे अपनी बांहों में भींचते हुए कहा- इतनी भी जल्दी क्या है.. अभी मेरा दिल भरा नहीं है!

मैंने विनती करनी शुरू कर दी- अगर देर हुई तो मेरे घर में बच्चे और परिवार वाले शक करेंगे..


पर वो मेरी बात जैसे सुनने को तैयार ही नहीं थे, वे मुझे चूमते हुए धकेलने लगे और मैं बाथरूम के दरवाजे के पास दीवार से टकरा गई।


मैं बार-बार ‘नहीं.. नहीं..’ कर रही थी.. पर उन्होंने मुझे इतनी जोर से पकड़ रखा था कि मैं पूरी ताकत लगा कर भी अलग नहीं हो पा रही थी।

मेरे बार-बार कहने को सुन कर उन्होंने अपना मुँह मेरे मुँह से लगा दिया और मेरा मुँह बंद कर दिया। उन्होंने अब अपने हाथ मेरे पीठ से हटा के चूतड़ों पर रख दिए।


अब मेरे चूतड़ों को जोर से दबाते हुए ऐसा करने लगे.. जैसे उन्हें फैलाना चाहते हों।

मैंने अपनी टाँगें आपस में चिपका रखी थीं और मेरा पूरा बदन टाइट हो गया था। वो अब मुझे चूमते हुए अपनी जुबान मेरे मुँह में घुसाने का प्रयास करने लगे.. पर मैंने अपने दोनों होंठों को पूरी ताकत से बंद कर रखा था।


उनके काफी प्रयास के बाद भी जब मैंने अपना मुँह नहीं खोला.. तो उन्होंने मेरी निचले होंठ को अपने दोनों होंठों से दबा लिया और खींचने-चूसने लगे, फिर दाँतों से दबा कर जोर से काट लिया।


मैं दर्द से सिसियाई और मैंने अपना मुँह खोल दिया.. फिर क्या था उन्होंने तुरंत अपनी जुबान मेरे मुँह में घुसा दी और मेरी जुबान को टटोलने लगे।


मैं भी अब समझ गई कि यह इंसान मानने वाला नहीं है, मैं भी अपनी जुबान को उनकी जुबान से लड़ाने लगी।

उधर वो मेरे चूतड़ों को दबाते और खींचते हुए अपने शरीर को मेरे शरीर से चिपकाते और धकेलते रहे।

हम दोनों काफी देर तक चूमते रहे।


अभी हमें सम्भोग किए मुश्किल से आधा घंटा ही हुआ होगा कि मुझे महसूस होने लगा कि उनका लिंग खड़ा हो रहा और मेरी नाभि को सहला रहा।

मेरी लम्बाई उनसे काफी कम थी.. सो उनका लिंग मेरी नाभि को छू रहा था। उनका अंदाज भी ऐसा था जैसे मेरी नाभि को ही सम्भोग केंद्र समझ लिया हो।


मैंने अपने पेट पर ज्यादा दबाव देख कर उनका लिंग हाथ से पकड़ लिया और हिलाने लगी। मेरे द्वारा उनके लिंग को कुछ ही पलों तक हिलाने से उनका लिंग पूरी तरह सख्त होकर खड़ा हो गया.. जो कि मेरी योनि में घुसने को तैयार हो चुका था।


उन्होंने मुझे चूमना छोड़ कर.. मेरे स्तनों को चूसना शुरू कर दिया। वे बारी-बारी से झुक कर थोड़ा थोड़ा चूस कर मुझे गरम करने लगे।

उनका हाथ मेरे चूतड़ों से हट कर मेरी जांघों में चला गया और कस के पकड़ कर उन्हें फैलाने की कोशिश करने लगे।

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मैं भी अब थोड़ा जोश में आने लगी और मेरी योनि फिर से गीली होनी शुरू हो गई, मैंने भी अपनी टाँगें फैला दीं और योनि उनके आगे खोल दी।


वो अब मेरी दोनों टाँगों के बीच चले आए और कमर थोड़ा झुका कर मेरी योनि के बराबर खड़े होकर अपने लिंग को मेरी योनि पर धकेलने लगे।


मैंने उनका लिंग अभी भी पकड़ रखा था और हिला रही थी.. पर जैसे ही उनका लिंग मेरी योनि के भग्नासे को छुआ.. मैं ऊपर से लेकर नीचे तक गनगना गई।

मैं तो पहली बार से भी ज्यादा खुद को गर्म महसूस करने लगी और उनके लिंग को पकड़ कर अपनी योनि की दरार के बीच ऊपर-नीचे रगड़ने लगी।

मैंने अपनी योनि को आगे की तरफ कर दिया.. और उनके लिंग के सुपाड़े को अपनी दाने जैसी चीज़ पर रगड़ने लगी।


वो अब मेरी जाँघों को छोड़ कर मेरे स्तनों को जोर-जोर से मसल कर मेरे चूचुकों को दाँतों से दबा-दबा कर खींचने और चूसने लगे।

मुझे अपने स्तनों में दर्द को तो एहसास हो ही रहा था.. पर उस दर्द में भी.. पता नहीं गर्म होने की वजह से मजा आ रहा था।


मैं जोर-जोर से लम्बी साँसें ले रही थी और मेरी सिसकियां उनकी हरकतों के साथ ताल मिला रही थीं।

मैं अब पूरी तरह से बेकरार सी हो गई और मैंने अपनी एक टांग पास में पड़ी कुर्सी पर रख अपनी योनि के छेद को लिंग के निशाने पर रख दिया.. और लिंग पकड़ कर सुपारे को योनि में घुसा लिया।


फिर मैंने उनके चूतड़ों को दोनों हाथ पीछे ले जाकर खुद को एक टांग से सहारा देकर अपनी योनि उनके तरफ धकेला.. लिंग आधा सरसराता हुआ मेरी योनि में घुस गया।

पता नहीं उनको मेरी योनि में लिंग घुसा हुआ महसूस हुआ या नहीं.. क्योंकि वो अभी भी मेरे स्तनों से खेलने और चूसने में व्यस्त थे।

मैंने खुद ही अपनी योनि को उनके लिंग पर धकेलना शुरू कर दिया और लिंग अन्दर-बाहर होने लगा।


पर शायद उनके दिमाग में कुछ और ही चल रहा था, उन्होंने मेरी योनि से अपना लिंग बाहर खींच लिया और मुझे चूमते हुए नीचे बैठ गए।


उन्होंने पहले मेरी नाभि और पेट में ढेर सारा चुम्बन किया और फिर मेरी योनि को एक हाथ से सहला कर योनि को चूमने लगे।


थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरी योनि के दोनों होंठों को फैला दिया और दो उंगली डाल कर अन्दर-बाहर करने लगे।


मैं तो पहले से इतनी गीली हो चुकी थी कि क्या कहूँ.. ऐसा लगने लगा था.. जैसे मेरी जान निकल जाएगी।


थोड़ी देर उंगली से खेलने के बाद मेरी योनि को उन्होंने और फैला दिया.. तो मैं कराह उठी और अपनी जुबान मेरी योनि से चिपका दी। वो मेरी योनि को चूसने लगे और जुबान को मेरी चूत के छेद पर धकेलने लगे।


उनके इस तरह करने से मैं और भी उत्तेजित हो रही थी और ऐसा लगने लगा कि अब ये मुझे ऐसे ही झड़ जाने पर मजबूर कर देंगे।


मैंने उनके सर को पकड़ा और बालों को खींचते हुए ऊपर उठाने का प्रयास करने लगी.. ताकि हम सम्भोग शुरू करें.. पर वो हिलने को तैयार नहीं थे।


मैंने अपनी एक टांग से खुद और ज्यादा सहारा नहीं दे पा रही थी कि तभी उन्होंने मेरी दूसरी टांग जो कुर्सी पर थी.. उसे उठा अपने कंधों पर रख दिया और अपना मुँह मेरी योनि से चिपका कर चूसने लगे.. ऐसे.. जैसे रस पीना चाहते हों।मेरे लिए अब बर्दाश्त करना मुश्किल था और मैंने दोनों जाँघों के बीच उन्हें कस कर दबा लिया.. पर उन पर तो कोई असर ही नहीं था।


वो अपनी जुबान को मेरी योनि के छेद में घुसाने का प्रयास करते.. तो कभी मेरी योनि के होंठों को दांतों से खींचते.. तो कभी मेरी दाने को काट लेते.. और मैं कराहती हुई मजे लेती रही।


मैं अब उनसे विनती करने लगी- आह्ह.. बस करो.. और शुरू करो न.. मुझे घर भी जाना है।

समुझे लगा कि उन्होंने मेरी बात सुन ली और मान गए, उन्होंने मेरी तरफ सर उठा कर देखा और कहा- चुदने के लिए तैयार हो?

मैंने भी उनके ही भाषा में कहा- अब तड़पाओ नहीं यार.. चोद भी दो..


फिर दोबारा उन्होंने मेरी योनि को चूमा और जुबान जैसे ही मेरे छेद पर लगाई.. मेरा फ़ोन बजने लगा।

फ़ोन की आवाज सुनते ही मेरा तो जोश ही ठंडा हो गया।


फ़ोन बगल में ही टेबल पर था और यह मेरी बड़ी जेठानी का था।

मैंने उंगली मुँह पर रख कर उन्हें चुप रहने का इशारा किया और फ़ोन उठा लिया।


जेठानी ने फ़ोन उठाते ही कहा- कब तक आओगी?

मैंने उत्तर दिया- बस एक-डेढ़ घंटे में पहुँच जाऊँगी।

तब उन्होंने कहा- मार्किट से थोड़ा मीठा और पनीर साथ ले आना।


मैंने हाँ बोल कर फ़ोन काट दिया और बोली- अब मुझे जाना होगा.. वरना घर में लोग तरह-तरह के सवाल करेंगे।

पर उन्होंने मेरी योनि को चूमते हुए कहा- अभी तो मजा आना बाकी है.. बस थोड़ी देर और रुक जाओ।


मैं तो अभी भी उसी अवस्था में थी.. मेरी एक टांग उनके कंधे पर और उनका मुँह मेरी योनि पर।

मैं ‘न.. न..’ करती रही.. फिर बोली- जल्दी करो..


वो भी मान गए.. पर इससे पहले कि वो खड़े होते.. मेरा फ़ोन फिर बजना शुरू हो गया.. इस बार तारा थी। मैंने तुरंत फ़ोन उठा लिया।


उधर से आवाज आई- हो गया या और समय लगेगा?

मैंने कहा- बस थोड़ी देर और..

उसने पूछा- अभी तक किया नहीं क्या कुछ भी?

मैंने जवाब दिया- बस थोड़ी देर और..


उसने कहा- ठीक है.. मजे ले लो.. मैं और इंतज़ार कर लूँगी।

और फ़ोन काट दिया।


मेरे फ़ोन रखते ही वो खड़े हो गए और मेरी एक टांग उठा कर कुर्सी पर रखते हुए बोले- तारा थी क्या?

मैंने कहा- हाँ।


उन्होंने कहा- उसे शक तो नहीं हुआ होगा?

मैंने कहा- शायद हो सकता है, अब जल्दी करो या मुझे जाने दो।


इतना कहते ही मुस्कुराते हुए उन्होंने मुझे चूम लिया और लिंग को हाथ से पकड़ हिलाते हुए मेरी योनि के छेद के पास ले आये।

मैंने भी अपनी कमर आगे कर दी और टाँगें फैला दी, फिर उन्होंने हाथ पे थूक लिया और सुपाड़े के ऊपर मल दिया और मेरी योनि की छेद पर टिका के दबा दिया।


मेरी योनि की छेद तो पहले से खुली थी और गीली भी थी, हल्के से दबाव से ही लिंग मेरी योनि में सरकता हुआ घुस गया, मुझे अजीब सी गुदगुदाहट के साथ एक सुख की अनुभूति हुई और मैंने अपनी आँखें बंद कर उन्हें कस के पकड़ते हुए योनि को उनके लिंग पे दबाने लगी।


मैं पूरे जोश में आ गई थी और अपनी कमर किसी मस्ताई हुई हथिनी के समान हिलाने लगी।

ये देख उन्होंने धक्के देने शुरू कर दिए, उन्हें भी शायद समझ आ गया था मेरी इस तरह की हरकत और मेरी गीली योनि में छप छप आवाज से कि मैं बहुत गर्म हो चुकी हूँ।


उन्होंने धक्के लगाते हुए मुझसे पूछा- मजा आ रहा है?

मैं भी तो मस्ती में थी, कमर उचकाते हुए बोल पड़ी- ‘बस कुछ मत बोलिए, बहुत मजा आ रहा है धक्के लगाते रहिये।

मेरी बात सुनने की देरी थी, उन्होंने एक हाथ मेरी चूतड़ों पर रखा और पकड़ कर अपनी तरफ खींचा और दूसरा हाथ मेरी पीठ पर रख मुझे कस लिया।


मैंने भी उनको कस के पकड़ लिया और उनके होठों पर होंठ रख चूमने और चूसने लगी। उनके धक्के जोर पकड़ने लगे और जिस तरह से उन्होंने मुझे पकड़ सहारा दिया था, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं खड़ी नहीं बल्कि लेटी हुई हूँ।

वो मुझे लगातार 10-15 धक्के मारते तेज़ी से, फिर 2-3 धक्के पूरी ताकत से मारते और लिंग पूरा मेरी योनि में दबा देते जड़ तक और कुछ पल अपनी कमर गोल गोल घुमा कर अपने लिंग के सुपाड़े को मेरी बच्चेदानी के ऊपर रगड़ते।


सच में इस तरह से मुझे बहुत मजा आ रहा था, भले ही उनके जोरदार झटकों से कभी कभी लगता कि मेरी योनि फट जायेगी पर जब वो सुपाड़े को रगड़ते तो जी करता कि जोर जोर से फिर झटके मारे।

मेरी हालत अब और बुरी होने लगी थी, मैं वासना के सागर में गोते लगाने लगी थी, मेरा मन पल दर पल बदल रहा था।


कभी उनके झटके मेरी चीख निकाल देते और सोचने लगती ‘भगवान् ये जल्दी से झड़ जाएँ’ तो कभी उनके सुपाड़े का स्पर्श इतना सुहाना लगता कि मन में आता कि भगवान बस ऐसे ही करते रहें।

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जैसे जैसे हमारे सम्भोग की समय बढ़ता जा रहा था, वैसे वैसे ही मेरे जोश और बदन में बदलाव आ रहा था, मैं पल पल और भी व्याकुल सी हो रही थी और मेरी योनि से पानी जैसा चिपचिपा रस रिस रहा था जो अब तो मेरी जांघों से होता हुआ नीचे बहने लगा था।


उधर वो भी पागलों की तरह धक्के मार रहे थे मुझे और मेरी योनि का अपने लिंग से जोरदार मंथन करते हुए पसीने से लथपथ होते जा रहे थे।

वो मुझे चूमते, काटते, मेरे चूचुकों को चूसते हुए हांफते रहे पर उनका धक्का लगाना कम नहीं हुआ, कभी रुक रुक कर तो कभी लगातार वो मुझे भी अपने साथ पागल किये जा रहे थे।

मैं भी उनके साथ साथ अपनी कमर हिलाने डुलाने लगी उनके धक्कों से ताल मिला कर!


हमे सम्भोग करते हुए करीब 20 मिनट हो चुके थे और मेरी एक जांघ में दर्द सा होने लगा था पर मैं पूरे जोश में थी, खुद ही दूसरी टांग उठाने लगी।

यह देख वो मेरी दोंनों जांघों को दबोच मुझे उठाने का प्रयास करने लगे।


मैं इतनी मोटी और भारी… भले कैसे उठा पाते वो… पर पीछे दीवार का सहारा थे तो मुझे उठा लिया और धक्के देते रहे।

मैंने भी उनके गोद में आते ही अपनी दोनों टाँगें उनकी कमर पर लपेट दी… हवस के नशे में कहाँ होश था कि वो मुझे उठाने लायक हैं या नहीं।


मैं उनके गले में हाथ डाल झूलते हुए लिंग को योनि में दबाती रही वो भी मुझे ऐसे ही मेरे चूतड़ों को पकड़ मुझे अपनी गोद में झुलाते, धक्के देते रहे।

करीब 3-4 मिनट के बाद उनकी ताकत कम सी होने लगी और उन्होंने मुझे वैसे ही अपनी गोद में उठाये अपने लिंग को मेरी योनि में घुसाए हुए मुझे जमीं पर लिटा दिया।


वो मेरे ऊपर झुकाते हुए अपने दांतों को पीसते हुए मेरे स्तनों को काटने और चूसने लगे और जैसे खीज में हो बड़बड़ाने लगे- ‘आज जी भर चोदूँगा तुम्हें, चोद चोद के तुम्हारी बूर का पानी सुखा दूंगा।


मैं उनके काटने और चूसने से सिसकारियाँ लेने लगी और कराहने भी लगी पर मेरे मुख से भी वासना भरी पुकार निकलने लगी- ऊईई… ईईइ.. सीईई आह्ह छोड़ो न, मैं झड़ने वाली हूँ, झाड़ दो मुझे।

और बस इतना कहना था कि उनके धक्के किसी राकेट की तरह तेज़ी से पड़ने लगे और मैं ओह माँ ओह माँ करने लगी।

मैंने दोनों टाँगें उनके सीने तक उठा दी और जोर से पकड़ लिया उनको।


5 मिनट ही हुए होंगे, उनके इस तरह के तेज़ धक्कों की ओर मैं अपनी योनि सिकोड़ते हुए झड़ गई। मैं उनको कस के पकड़ते हुए अपनी कमर उठाने लगी और उनका लिंग पूरा पूरा मेरी बच्चेदानी में लगता रहा जब तक कि मेरी योनि से पानी झड़ना खत्म न हुआ।

मैं अभी भी चित लेटी उनके धक्के सह रही थी क्योंकि जानती थी वो अभी झड़े नहीं बल्कि और समय लगेगा क्योंकि दोबारा मर्द जल्दी झड़ते नहीं।


मेरी पकड़ अब ढीली पड़ने लगी थी, मेरी टाँगें खुद उनके ऊपर से हट कर जमीं पर आ गई थी, मैं उन्हें हल्की ताकत से बाहों से पकड़ी सिसकती और कराहती धक्के खा रही थी।

वो मुझे अपने दांतों को भींचते हुए मुझे देख धक्के लगाते ही जा रहे थे और मैं उन्हें देख रही थी कि उनके सर से पसीना टपक रहा था और नीचे योनि और लिंग की आसपास तो झाग के बुलबुले बन गए थे।


करीब 7-8 मिनट यूँ ही मुझे धक्के मारने के बाद उन्होंने मुझे उठाया और अपनी टाँगें आगे की तरफ फैला मुझे गोद में बिठा लिया।

मैं समझ गई कि अब धक्के लगाने की बारी मेरी आ गई।

पर मेरी हिम्मत अब जवाब देने लगी थी।


वो मुझे अपने दांतों को भींचते हुए मुझे देख धक्के लगाते ही जा रहे थे और मैं उन्हें देख रही थी कि उनके सर से पसीना टपक रहा था और नीचे योनि और लिंग की आसपास तो झाग के बुलबुले बन गए थे।


करीब 7-8 मिनट यूँ ही मुझे धक्के मारने के बाद उन्होंने मुझे उठाया और अपनी टाँगें आगे की तरफ फैला मुझे गोद में बिठा लिया।

मैं समझ गई कि अब धक्के लगाने की बारी मेरी आ गई।

पर मेरी हिम्मत अब जवाब देने लगी थी।


मैं भी आधे मन से उनके लिंग के ऊपर बैठने उठने लगी जिससे लिंग योनि में अन्दर बाहर होने लगा।

पर यह क्या… मेरी पकड़ कुछ पलों के धक्कों में फिर से मजबूत हो गई और मेरी योनि भी कसने लगी। मैं फिर से गर्म हो गई और जोरों से धक्के लगाने लगी।

मुझे ऐसा लगने लगा कि अब तो मैं फिर झड़ जाऊँगी और पता नहीं क्यों मेरा मन फिर से पानी छोड़ने को होने लगा। मैं तेज़ी से धक्के लगाने लगी तो वो भी मेरी हरकतें देख नीचे से जोर जोर झटके देने लगे।


हम दोनों हांफ रहे थे और एक दूसरे को देखते हुए बराबर धक्के लगाने लगे। इतने में मेरा फिर से फ़ोन बजने लगा मैं उसकी आवाज दरकिनार करते हुए पूरे जोश से लिंग को योनि में घुसाने लगी तेज़ी से।

यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं !


मैं अपनी कमर इतना उठा देती कि लिंग का सुपारा ही बस अन्दर रहता और जोर से फिर धकेलती कि लिंग पूरा योनि में मेरी बच्चेदानी तक जाता।

मैं ये सब तेज़ी से करने लगी और फिर एक पल ऐसा आया जिसका मुझे इंतज़ार था, जिसके लिए मैं इतनी मेहनत कर रही थी।

फिर से मेरी पूरा बदन अकड़ने लगा, योनि सिकुड़ने लगी।


मैंने एक झटके के साथ उनके होठों से अपने होंठ भिड़ा दिए और जुबान को चूसने लगी, गले में हाथ कस दिए और लिंग जबकि पूरा मेरी बच्चेदानी तक था, फिर भी मेरी कमर हिल हिल कर धक्के देते हुए मैं झड़ने लगी, मैंने चिपचिपा पानी सा रस छोड़ दिया उनके लिंग के ऊपर से जो उनके अण्डकोषों और जांघों को भीगा रहा था।


धीरे धीरे मेरे धक्के कमजोर पड़ते गए और मैं तब रुकी जब मैं पूरी तरह चरम सुख तक पहुँच गई।

मैं उनकी गोद में ही थी और उनका लिंग मेरी योनि के भीतर ही था, मैंने कहा- अब बस करें… बार बार फ़ोन बज रहा है, घर जाना है।

उन्होंने मुझसे कहा- बस थोड़ी देर और… अभी तो मजा आना शुरू हुआ है।


हम बातें करते हुए कुछ पल ऐसे ही हल्के धक्के लगाते रहे, फिर मैंने फ़ोन सामने से उठा कर देखा तो तारा का मिस कॉल था।

मैंने उनसे कहा- अब या तो जाने दो या जल्दी करो, तारा परेशान हो रही होगी।


इतना कहना था कि तारा का फ़ोन फिर से आ गया।

मैं तो जानती थी कि तारा को सब मालूम है, मैंने फ़ोन उठा लिया फ़ोन उठाते ही आवाज आई- और कितना टाइम लगेगा?

मैंने जवाब दिया- बस निकलने की तयारी कर रही हूँ।

वो भी समझ गई, उसने फ़ोन रख दिया।


उन्होंने मुझे उठने का इशारा किया और मैं बिस्तर पर जाकर लेट गई, वो भी उठ कर आये और मेरी टांगों के सामने घुटनों के बल खड़े हो गए।

मैंने स्वयं ही अपनी टाँगें फैला दी उनके लिए पर उन्होंने मेरी टाँगें उठा कर अपने कंधो पर रखी और लिंग को हाथ से हिलाते हुए मेरी योनि की छेद पे टिका कर घुसाने लगे।


लिंग मेरी योनि में घुसते ही वो मेरे ऊपर पूरी तरह लेट गए और अपने दोनों हाथों से मेरे चूतड़ पकड़ कर मेरे होठों को चूसते हुए धक्के लगाते हुए सम्भोग करने लगे।

मैंने अपनी टाँगें उठा कर उनकी जांघों पर रख दी और उनका मुँह अपने होठों से अलग करते हुए बोली- अब जल्दी जल्दी करो… देर हो रही है।


तब उन्होंने भी तेज़ी से धक्के लगाने शुरू कर दिए और मैंने भी जल्दी खत्म हो… सोच कर अपनी कमर उनके हर धक्के पर उठाने लगी।

दो मिनट के धक्कों में मैं फिर से गर्म होने लगी और फिर क्या था, उनके जोश और मेरे जोश से धक्कों की रफ़्तार और ताकत इतनी हो गई कि बिस्तर भी हिलने लगा।


मैं कराहते और सिसकते हुए पूरी मस्ती में उनके लिंग से अपनी योनि को रगड़ते हुए धक्के लगाने लगी।

वो मेरे चूतड़ों को पूरी ताकत से दबाते हुए खींचते और जोर जोर से धक्के देते तो कभी मेरे स्तनों को बेरहमी से काटे और चूसते।


इधर मैं भी कभी उनके सर के बालों को जोर जोर से खींचती तो कभी अपनी टांगों से उनको पूरी ताकत लगा दबोचने की कोशिश करते

हुए अपनी कमर उठा देती जिससे लिंग मेरी योनि की पूरी गहराई तक जाता।

पूरा कमरा हम दोनों के हांफ़ने और सिसकारने से गूंजने लगा था।


करीब 10 मिनट के जोरदार धक्कों के बाद वो पल भी आ गया जिसके लिए हम दोनों इस तरह मेहनत कर रहे थे।

मैं उनके सुपारे की गर्मी को अपनी बच्चेदानी में महसूस करने लगी और समझ गई कि अब वो झड़ने को हैं और इधर मेरी जांघों और योनि में भी अकड़न होने लगी।


मेरी साँसें लम्बी होने लगी, उधर उनके भी धक्के तेज़ी से मुझे लगने लगे, मैं कराहते हुए उह्हह्म्म आह्ह्ह्ह करते हुए पानी छोड़ने लगी और उनको पूरी ताकत से पकड़ अपनी कमर बार बार उठा कर नीचे से धक्के देने लगी।

वो भी अपनी पूरी ताकत के 15 20 धक्के लगाते हुए मुझसे चिपक गए और अपना रस मेरी योनि की गहराई में छोड़ कर शांत हो गए।


मैं भी उनके शांत होते ही 2-4 झटके देती हुई उनको पूरी ताकत से पकड़ शांत हो गई।

मैं धीरे धीरे अपनी पकड़ ढीली करने लगी। कुछ देर क बाद और भीतर से थकी और संतुष्ट सी लगने लगी।

उनका भी शरीर अब ढीला पड़ने लगा और उनका लिंग मेरी योनि के भीतर सिकुड़ने लगा।


कुछ देर के बाद हम दोनों उठे और बाथरूम जाकर खुद को साफ किया, फिर अपने अपने कपड़े पहन कर तैयार होकर तारा को फ़ोन किया।

तारा के आते ही हमने चाय मंगवाई और बातें करने लगे।


शाम के करीब 4 बज गए थे, मुझे घर भी जाना था तो मैं जल्दी निकलने के चक्कर में थी पर तारा और उनकी बातें बढ़ती ही जा रही थी।

मैंने जल्दी जल्दी निकलने को बोला उन्हें और फिर हम अपने अपने घर चले आये।


रात को सोते समय जब मैं कपड़े बदल रही थी गौर किया कि मेरी पैन्टी में दाग सा है जो सूख कर कड़ा हो गया है।

मुझे फिर याद आया कि उनका वीर्य मेरी योनि के भीतर से बह कर मेरी पैन्टी गीली कर गया था, इसी वजह से रास्ते भर मुझे मेरी पैन्टी गीली गीली सी लग रही थी।

शायद जल्दबाजी में मैंने अपनी योनि ठीक से साफ़ नहीं की थी।


मैं मन ही मन मुस्कुराते हुए एक संतुष्टि की सांस लेते हुए लेट गई और न जाने कब मेरी आँख लग गई।


मैं अपने उस दोस्त से मिलकर काफी संतुष्ट थी और उनसे उस दिन के बाद भी याहू चैट पर बातें चलती रहीं।


हमारे मिलन को एक हफ़्ता गुजर चुका था.. और तारा भी वापस चली गई थी।


हम दोनों यूँ ही चैटिंग के जरिए अपने मन की मंशा शब्दों के जरिए एक-दूसरे को बताते रहे।


करीब दो महीने बीतने के बाद उन्होंने फिर से मिलने की जिद शुरू कर दी.. पर मेरे लिए ये मुमकिन नहीं था। फिलहाल तारा जा चुकी थी और मैं कोई बहाना नहीं बना सकती थी.. क्योंकि मुझे किसी और पर भरोसा नहीं था।


वो रोज मुझसे मिलने की बात करते.. पर मैं हमेशा बस कुछ बहाना बना कर टाल देती या उनको दिलासा देती ‘मौका निकाल कर मिलूंगी।’


फिर एक दिन उन्होंने मुझे एक उपाय बताया। शुरू में तो मुझे बड़ा अटपटा सा लगा.. फिर सोचा कि चलो इसी बहाने कुछ नया अनुभव होगा।


उनके कुछ दोस्त एक व्यस्क दोस्तों को खोजने की साईट पर थे.. पहले तो उन्होंने मुझे एक दम्पति से वहाँ मिलवाया। फिर एक लड़की जो जबलपुर की थी उससे मिलवाया।

मैं उनसे बातें करने लगी और कुछ ही दिनों में दोस्ती भी हो गई पर अब भी मुझे भरोसा नहीं हो रहा था.. क्योंकि मैंने किसी को देखा नहीं था।


फिर एक दिन मेरे फ़ोन पर एक सन्देश आया कि अगर मैं मिलना चाहती हूँ तो वो लोग हजारीबाग आ जाएंगे।

मैंने सन्देश से पूछा- कौन?

तो जवाब आया- मेरा नाम शालू है, मैं आपसे मिलने के लिए आपको घर से ले सकती हूँ।


शालू और वे दम्पति एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।


मैं पहले तो सकपका गई कि ये क्या हो रहा है.. क्योंकि मैं किसी मुसीबत में नहीं पड़ना चाहती थी।

मैं रात का इंतज़ार करने लगी ताकि मैं उस दोस्त से बात करके सब सच जान सकूँ।


रात के करीब 12 बजे हमारी बात शुरू हुई। मैंने सबसे पहले वही पूछा.. तब उन्होंने बताया- आपका नंबर शालू को मैंने ही दिया था।

मैं थोड़ा विचलित हो गई।


उन्होंने कहा- अगर आपकी राजी हों.. तो हम लोग आपसे आपके घर पर शालू को आपकी सहेली बना कर भेज सकते हैं, वो आपको बाहर ले जा सकती है।


मुझे पहले तो अटपटा सा लगा.. मैंने इंकार कर दिया.. क्योंकि इसमें बहुत खतरा था। वो मेरे बारे में आखिर जानती क्या थी.. जो मुझे यहाँ से निकाल कर ले जाती.. मेरे पति को क्या जवाब देती अगर वे कोई सवाल करते तो?


मैंने साफ़ मना कर दिया.. पर वे लोग मुझे रोज जोर देने लगे। कभी कभी उनकी मादक इच्छाओं को देख मेरा भी मन होने लगता.. पर मुझे बहुत डर लगता।


कुछ दिनों के बाद उस लड़की शालू का फिर से सन्देश आया और वो मुझे याहू पर बात समझाने लगी.. अपनी तरकीब बताने लगी।

फिर उस दम्पति ने भी मुझे अपनी बातों में उलझाने का प्रयास शुरू कर दिया, वो लोग मुझे रोज कहने लगे कि मैं बस अपनी मर्ज़ी ‘हाँ’ बता दूँ.. बाकी वो लोग तरकीब निकाल लेंगे।


तभी मेरी जेठानी के पिता के मरने की खबर आई और वो लोग सपरिवार चले गए। अब घर में बस मैं.. मेरे बच्चे और देवर थे।

मुझे लगा कि ये सही मौका है मेरे लिए और मैंने ‘हाँ’ कह दिया।


उन्होंने अपनी सारी तरकीब मुझे बता दी और मैंने भी अपनी सारी बातें बता दीं ताकि कोई सवाल करे.. तो वो लोग सही जवाब दे सकें।

उन्होंने दो दिन के बाद मुझे सन्देश भेजा कि वो लोग हजारीबाग में हैं और अगले दिन मेरे घर मुझे लेने वो दो औरतें आएँगी।


मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा कि भगवान जाने क्या होगा।


मैंने वासना की आग में भूल कर ये क्या कर दिया। कहीं किसी को शक हुआ तो क्या होगा।

कहीं मेरी चोरी पकड़ी तो नहीं जाएगी.. बस यही सभी बातें सोचती हुई.. मैं रात भर सोई नहीं।


सुबह करीब 4 बजे मेरी आँख लगी और रोज की आदत होने के वजह से 6 बजे उठ गई। मेरे दिमाग में बस उनकी ही बातें थीं।

मैंने अब सोच लिया कि मैं उन्हें मना कर दूँगी।


करीब 9 बजे उनका फ़ोन आया.. तब मैंने पहली बार उस जबलपुर वाली लड़की से बात की।

उसने मुझसे कहा- मैं और एक और औरत तुम्हें लेने आ रही हैं.. तुम तैयार रहना।


मैंने तुरंत जवाब दिया- मत आओ मुझे डर लग रहा है.. कहीं मेरी चोरी पकड़ी न जाए।

पर उन्होंने मुझे बहुत भरोसा दिया कि कुछ नहीं होगा.. वो सब कुछ संभाल लेंगी।


मैंने उनको बहुत समझाया.. पर वो नहीं मानी। तब मैंने तुरंत जा कर अपनी देवरानी को बताया- मुझसे मिलने मेरी दो सहेलियां आ रही हैं। हो सकता है कि मैं उनके साथ थोड़ा घूमने और बाज़ार करने शहर जाऊं.. क्या तुम चलोगी मेरे साथ?


मैं जानती थी कि बच्चों की वजह से वो बाहर नहीं जा सकती और घर पर वो अकेली भी है.. पर उसे शक न हो इसलिए मैंने उससे जानबूझ कर साथ चलने के लिए कहा था।


उसने कहा- दीदी अगर मैं भी चली जाउंगी.. तो घर पर कौन रहेगा और बच्चों को अकेला कौन देखेगा और आपके देवर भी काम पर चले जायेंगे।

ये कह कर उसने मुझसे कहा- आप अकेली चली जाओ।

मैंने कहा- जरूरी नहीं कि मैं जाऊं ही.. मैंने इसलिए कहा कि हो सकता है वो मुझे साथ चलने के लिए कहें।


इतना कह कर मैं अपने देवर के पास गई और सारी बातें बता दीं।


देवर ने कहा- भाभी घर पर बड़े भैया और भाभी नहीं हैं.. सो मैं कुछ नहीं कह सकता.. पर अगर जाओ तो शाम तक लौट आना।


मैंने भी ज्यादा जोखिम न उठाते हुए तुरंत जेठानी को फ़ोन कर सारी बातें बता दीं.. तो उन्होंने शायद अपने घर की हालत देखते हुए ज्यादा बात नहीं की और इजाजत दे दी।


ये सारी बातें मेरे लिए कुछ राहत भरी थीं.. और अब मैं बस उनका इंतज़ार करने लगी।


करीब 20 मिनट के बाद मेरा फ़ोन बजा.. तो देखा कि शालू का फ़ोन था।


मैंने फ़ोन उठाया तो उसने कहा- मैं आपके घर के पास ही हूँ.. मुझे अपने घर का रास्ता बताओ।

मैंने उससे पूछा- फ़िलहाल कहाँ हो?


मेरी मंशा थी कि मैं खुद जाकर उससे पहले बाहर मिल लूँ।

मैं उसके बताई हुई जगह पर जाने के लिए निकली और मैंने देवर से कहा- मेरी सहेलियाँ बाहर खड़ी हैं.. मैं उन्हें लेकर आती हूँ।


मैं उनके बताई जगह पर गई तो देखा एक कार खड़ी थी और कार से बाहर एक लड़की सलवार सूट में खड़ी थी.. शायद मुझे ढूँढ रही थी।


उसने मुझे देखते ही मेरा नाम लेकर मुझे पुकारा.. तो मैंने भी उसका नाम लिया।

फिर हम एक-दूसरे को पहचान गए।


मैं उनकी कार के पास गई तो अन्दर से एक और औरत जो बिल्कुल मेरी ही उम्र की थी.. बाहर आई और मुझसे हाथ मिलाते हुए कहा- बहुत सुना तुम्हारे बारे में।


मेरा तो दिमाग ही काम नहीं कर रहा था.. फिर भी अपने दिल की धड़कनों को काबू में करती हुई मैंने उन्हें घर आने को कहा।

रास्ते में वो मुझे कहती आईं कि मैं बिल्कुल न डरूं.. बाकी वो लोग सब संभाल लेंगे।


उन्होंने मुझे अपना परिचय दे दिया। एक शालू थी.. जो करीब 32 साल की थी.. पर शादीशुदा नहीं थी। दूसरी बबीता थी.. जिसके 2 बच्चे हैं और वो दिल्ली में रहती है।


वो लोग यहाँ अपनी एक रिश्तेदार की शादी में आई हुई थीं। उन्होंने पूरी कहानी गढ़ दी थी.. बस मुझे उस पर थोड़ा एक्टिंग करना था।


कार के ड्राईवर को वहीं गाड़ी में रहने दिया और मैं उन्हें लेकर घर आ गई। बच्चे तो अब तक स्कूल चले गए थे और देवर बस निकलने ही वाले थे।


देवर के जाते-जाते मैंने उन्हें मिलवा दिया और कहा- ये लोग मुझे साथ शहर चलने को कह रही हैं।


मेरे कहने के साथ ही वो दोनों मेरे देवर से विनती करने लगीं कि मुझे जाने दें.. शाम होने से पहले मुझे वापस छोड़ देंगे।

इस पर देवर ने ‘हाँ’ कह दिया और चले गए।


मैंने उन्हें बिठाया.. चाय नाश्ता दिया। फिर मैंने देवरानी को उनके सामने बातचीत करने को बिठा दिया और मैं अपने कमरे में तैयार होने चली गई।


मैं करीब 20 मिनट के बाद बाहर आई तो देखा कि वो लोग मेरी देवरानी से काफी घुल-मिल गई हैं.. मुझे और भी डर लगने लगा कि कहीं उन्होंने मेरा राज़ तो नहीं खोल दिया।

मैं उनसे बोली- चलें?

तो उन्होंने तुरंत उठ कर चलने की तैयारी कर ली।


मेरी देवरानी से विदाई लेकर वो लोग मुझे अपने साथ ले कर कार में बैठ गए।


मैं जितना डर रही थी उतनी ही आसानी से सब कुछ हो गया। रास्ते में मुझे बबीता ने बताया कि वो अपने पति के साथ आई हुई है।


हम यूँ ही बस एक-दूसरे से जान-पहचान करते हुए शहर पहुँच गए और ड्राईवर ने एक बड़े से होटल के सामने कार खड़ी कर दी।

हम कार से निकले और ड्राईवर कार लेकर वहाँ से चला गया।


हम होटल में गए और लिफ्ट से पांचवें माले पर गए, फिर हम तीनों वहाँ से एक कमरे की ओर बढ़े।

तब मैंने पूछा- मेरे वो दोस्त और बबीता का पति कहाँ है?

इस पर शालू और बबीता हँसते हुए बोलीं- कमरे में चलो.. सब देख लेना खुद से।


शालू ने अपने बैग से कमरे की चाभी निकाली और दरवाजा खोला। उन्होंने अन्दर जाते हुए मुझे भी अन्दर आने को कहा और फिर दरवाजा अन्दर से बंद कर दिया।


कमरा क्या शानदार था.. चारों तरफ परदे और साज-सजावट थी.. जैसे कि किसी फिल्म में होता है। सामने सोफा और टेबल था और शायद बेडरूम अन्दर था।


मैं सोफे की तरफ बढ़ी.. पर वहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा था। थोड़ा और आ गए गई.. तो हल्की आवाज मेरे कानों में पड़ी.. जैसे कोई औरत कराह रही हो।


मुझे एक पल के लिए तो ऐसा लगा कि शायद मेरे कान बज रहे हैं क्योंकि वासना का ही तो खेल खेलने मैं इनके साथ आई थी।


तभी एक लड़की के चिल्लाने की तेज़ आवाज आकर शांत हो गई। मैं सपाक से उनकी तरफ देखते हुए पूछने लगी- यहाँ और कौन है?

वो दोनों मुस्कुराते हुए मुझे अन्दर चलने को बोलीं और कहा- खुद देख लो।


अन्दर जाते ही जो नज़ारा मैंने देखा उसे देख कर तो मेरे जैसे होश ही उड़ गए।

उम्म्ह… अहह… हय… याह…


मैं दरवाजे के सामने ही खड़ी थी और वो नजारा मुझे सुधबुध खोने पर विवश कर रहा था।

अन्दर मैंने देखा के बिस्तर पर दो मर्द हैं.. जिसमें से एक पीठ के बल लेटा हुआ नज़ारा देख रहा था और दूसरा भी नंगा लेटा हुआ अपने लिंग को हाथ से सहला रहा था।


उनके पास में एक बहुत गोरी औरत थी, जिसके भरे-भरे स्तन और उठे हुए चूतड़ थे वो भी एकदम नंगी.. टांगें फैला कर पीठ के बल लेटी हुई थी। उसके ऊपर एक 50-55 साल का आदमी उसकी टांगों को पकड़े हुए हवा में झुलाते हुए अपने लिंग को उसकी योनि में तेज़ी से धकेलता हुआ अन्दर-बाहर कर रहा था।


इतना देख कर अभी मैं हैरान ही थी कि शालू ने मेरा हाथ पकड़ अन्दर खींचा। मैंने दो कदम आगे बढ़ाए ही थे कि मेरी बाईं ओर मैंने देखा कि एक औरत चेयर पर आगे की तरफ नंगी हो कर झुकी हुई है और पीछे वो मेरा दोस्त उसके स्तनों को दबोचे हुए उसके योनि में लिंग घुसा कर धक्के दे रहा था।


मैं जब बाहर से अन्दर आ रही थी तो कराहने, सिसकने और हाँफने की आवाज उम्म्ह… अहह… हय… याह… बढ़ती जा रही थीं और जब अन्दर आई तो ऐसा माहौल था कि पूरा कमरा उन दोनों औरतों की कराहों से गूंज रहा था।


मुझे देखते ही मेरे उस पुराने मित्र ने धक्के लगाने छोड़ दिए और वो मेरी तरफ आ गए। तभी वहाँ बिस्तर पर लेटा हुआ आदमी खड़ा होकर उस औरत के पास चला गया। लेकिन उस औरत ने उसे मना किया और कहा- पहले इन सबसे मिल तो लेने दो।


मुझे आई देख कर वे लोग भी.. जो बिस्तर पर सम्भोग कर रहे थे.. वो भी अलग हो गए और सब लोग बैठ कर मेरी ओर देखने लगे।


मैं तो शर्म से पानी-पानी हुई जा रही थी साथ ही ये नज़ारे देख कर घबराने के साथ-साथ कुछ दंग भी थी। मेरे सामने 4 नंगे मर्द और दो नंगी औरतें थीं। हम तीनों बबिता शालू और मैं ही बस कपड़ों में थे।


तब मेरे उस मित्र ने कहा- शालू और बबिता से तो आप मिल ही चुकी हो। इन से मिलो.. ये रामावतार जी हैं, बबिता के पति।


रामावतार वो थे.. जो नंगी औरत के साथ बिस्तर पर सम्भोग कर रहे थे। वो जो लेटा हुआ था और बिस्तर पर जो औरत संभोग कर रही थी.. उनके बारे में बताया गया।


‘ये विनोद और अमृता हैं.. पति-पत्नी हैं।’


फिर वो जो मेरे मित्र के हटने के बाद उठ कर खड़े हुए थे.. वो कांतिलाल जी थे और जिसके साथ मेरा मित्र खुद सम्भोग कर रहा था.. वो रमाबेन जी थीं.. मतलब कांतिलाल की पत्नी थीं।


रामावतार और बबिता कानपुर से आए थे। कांतिलाल और रमा जी गुजरात से.. और विनोद और अमृता कनाडा में रहते थे। वे कनाडा से छुट्टियों में यहाँ आए थे।

ये सब व्यस्क दोस्तों को खोजने की साईट से ही मिले थे।


अब इन सभी से मुझे भी मिलवा दिया गया था। सबसे जान पहचान होने के बाद मैंने थोड़ी राहत की सांस ली.. क्योंकि उनकी सोच बड़े खुले विचारों की थी। उनकी सोच जानकर ऐसा लगा.. जैसे ये भारतीय नहीं बल्कि कोई विदेशी लोग हों।


विनोद और अमृता तो खैर हिंदी कम अंग्रजी ज्यादा ही बोलते थे। सबके अपने-अपने परिवार और बच्चे थे.. सिवाए शालू के.. क्योंकि वो शादीशुदा नहीं थी।


शालू ही अकेली हम में सबसे कम उम्र की थी.. बाकी हम सब 45 के ऊपर ही थे। बबिता 40 की थी, रामजी 43, अमृता 46 की, शालू 32 की और मैं 47 की, विनोद 50, रामावतार जी 48, कांतिलाल भी 50 के थे।


मैंने ऐसा पहली बार नजारा देखा कि नंगे होकर कुछ लोग मुझे अपना परिचय दे रहे हैं। मेरा ध्यान तो बस इस पर था कि अब आगे क्या होगा। उनकी बातों से तो ऐसा लग रहा था जैसे उनके लिए ये सब आम बात थी.. पर मेरे लिए ये सब नया था।


इन सबसे मुझे तारा की उन सारी बातों पर यकीन हो चला था जिसमें उसने अलग-अलग लोगों के साथ सामूहिक सम्भोग की बात कही थी।


मैं ये सब सोच ही रही थी कि तभी मेरे पीछे से कांतिलाल जी ने अपना हाथ आगे बढ़ा कर मेरा पल्लू नीचे गिरा दिया, मैं तुरंत पीछे घूमी तो वो मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे।


मैंने पलट कर अपना पल्लू वापस उठाने का प्रयास किया तो मेरे पुराने वाले मित्र ने मेरा हाथ पकड़ कहा- इन खूबसूरत स्तनों को क्यों छुपा रही हो?


मेरे ब्लाउज से मेरे अधनंगे स्तन दिख रहे थे और सबकी निगाहें मेरे स्तनों पर थीं।


तभी अमृता और रमा जी मेरे सामने खड़े हो गए और मेरे स्तनों की बराबरी अपने से करने लगीं। अमृता बिलकुल किसी गोरी अंग्रेज की तरह ही गोरी, लम्बी और सुन्दर थी। उसके स्तन करीब 36 इंच के एकदम सुडौल थे। उसके कूल्हे भी उठे हुए थे.. योनि के बाल साफ़ किए हुए थे जिस वजह से उसकी योनि फूली हुई और एकदम चमकती हुई दिख रही थी।

उसकी योनि के द्वार पर सम्भोग की वजह से पानी सा लगा था.. जिससे ये अंदाज़ा हो रहा था कि उसकी योनि अभी भी गीली थी।


यही हाल रमा जी का भी था, उनकी योनि पर भी पानी सा था और उनकी योनि की दोनों पंखुड़िया बाहर की ओर लटकी सी थीं। उनकी योनि पर हल्के काले बाल थे.. जो कि छंटाई किए हुए थे। उनके स्तन अमृता से बड़े और गेहुंए रंग के थे और उन पर बड़े-बड़े चूचुक थे।


तभी बातें करते हुए रमा जी मेरे ब्लाउज के हुक खोलने लगी। उन्होंने एक-एक करके मेरे ब्लाउज और ब्रा खोल कर अलग कर दिया।


इसके बाद क्या था.. कांतिलाल जी ने मेरे स्तनों को पीछे से दबाते हुए मुझे बिस्तर पर खींच लिया और मुझे अपने ऊपर पीठ के बल लिटा कर मेरे गर्दन और गालों का चुब्बन शुरू कर दिया। पता नहीं मुझे अजीब सा लग रहा था फिर भी मैं विरोध नहीं कर रही थी।


कांतिलाल जब मेरे स्तनों को दबाते हुए मुझे चूम रहे थे.. तब अमृता ने मेरी साड़ी खींच कर खोल दी थी और पेटीकोट का नाड़ा भी खोल कर उसे खींचते हुए निकाल कर दूर फेंक दिया था।


अचानक मैंने देखा के मेरी बाईं ओर विनोद आ गिरा और उसके ऊपर शालू चढ़ गई। शालू जोरों से होंठों को होंठों से लगाकर चूमने लगी।


विनोद तो पहले से नंगा था सो विनोद धीरे-धीरे शालू को चूमते हुए उसके कपड़े उतारने लगा और कुछ ही पलों में शालू भी नंगी हो गई। इधर कांतिलाल जी के हाथों की पकड़ और भी मजबूत सा लगने लगी थी।


मुझे और मेरे कूल्हों के बीच उनका तना हुआ लिंग मुझे चुभता सा महसूस हो रहा था। तभी मेरी जांघों पर किसी के गरम हाथों का स्पर्श हुआ मैंने अपना सर थोड़ा ऊपर करके देखा तो मेरा वो पुराना दोस्त मेरी ओर मुस्कुराता हुआ मेरी योनि को पैन्टी के ऊपर से चूमने लगा। उसकी नज़रें मेरी ओर थीं और होंठ मेरी योनि के ऊपर थे। अचानक उन्होंने मेरी पैन्टी को पकड़ एक झटके में खींच का निकाल दिया और मुझे पूरी तरह से निर्वस्त्र कर दिया।


इसके तुरंत बाद ही उन्होंने मेरी योनि को चाटना शुरू कर दिया। इधर कांतिलाल जी मुझे जोरों से पकड़े हुए अपने ऊपर लिटाए थे और मेरे स्तनों को बेरहमी से मसलते हुए मेरी गर्दन.. कंधों पर चुम्बनों की बरसात किए जा रहे थे।


मेरे पुराने मित्र की मेरी योनि में घूमती हुई जुबान मुझे बैचैन सी करने लगी। मेरे बदन में गर्मी सी आने लगी और योनि गीली ही होती चली जा रही थी।

मुझे ऐसा लग रहा था जैसे किसी इंसान पर किसी बुरी आत्मा का साया हावी होता चला जाता है.. वैसे ही मेरे बदन पर वासना का साया हावी होता जा रहा हो।

अब तो मुझे यूँ लगने लगा कि मैं अब वासना के अधीन होती जा रही हूँ।


मेरी बैचैन इतनी बढ़ गई कि मैं पूरी ताकत लगा कर कांतिलाल जी की बांहों से आजाद हो उठ बैठी।

वो लोग एकाएक मुझे देखने लगे.. शायद उन्हें लगा होगा कि मुझे ये पसंद नहीं आया।


मैंने कुछ पलों के लिए सांस ली.. तो सामने देखा रामावतार जी कुर्सी पर बैठे हुए थे और उनका लिंग रमा जी पकड़े हुए थीं। उनके बगल में बबिता जी भी खड़ी थीं।


वो लोग सभी मुझे आश्चर्य से देख रही थीं.. तभी मैंने अपने उस दोस्त को पकड़ा और होंठों से होंठ लगा उन्हें चूमने लगी। ये देख सभी को थोड़ी राहत सी मिली और फिर से सब अपने-अपने कामों में लग गए।


मेरे चूमने की स्थिति देखते ही कांतिलाल जी उठ कर फिर से मेरे पीछे से मेरे स्तनों से खेलने और मुझे चूमने लगे।


मैंने चोर नजरों से कमरे का नजारा देखने की सोची.. फिर हल्के से आँखों को खोल कर देखा तो हमारे ठीक सामने रामावतार जी वैसे ही कुर्सी पर बैठे थे और रमा जी उनका लिंग चूसने के साथ सहला भी रही थी, वो जमीन पर घुटनों के बल खड़ी हुई थीं।

बबिता रामावतार जी के होंठों से होंठों को लगा चुम्बन कर रही थीं।


इस वासना के खुले खेल को देख कर मेरी कामोत्तेजना और बढ़ गई थी।


चुम्बन के दौरान रामावतार जी के दोनों हाथ बबिता के साड़ी के अन्दर थे और वो उनके चूतड़ों को दबा और सहला रहे थे। कुछ पलों के चुम्बन और चूसने की क्रिया के बाद बबिता अलग हुई और अपनी साड़ी उठा कर उसने अपनी पैन्टी उतार दी।


बबिता ने अपनी साड़ी को कमर तक उठाया और अपनी एक टांग को कुर्सी के ऊपर रख कर अपनी योनि खोल दी। बस फिर क्या था.. रामावतार जी ने दोनों हाथों से बबिता की जांघों को पकड़ा और उसकी योनि को चाटने लगे।


इधर जब मैंने नजर घुमाई तो देखा कि शालू विनोद के लिंग के ऊपर उछल रही थी और विनोद उसके स्तनों को दबाते हुए खुद भी अपनी कमर उठा कर शालू के धक्कों का जवाब दे रहा था।


विनोद और शालू को देख कर मेरा तो अब ध्यान बंट सा गया था। मेरा शरीर एक तरफ तो पूरी तरह कामोत्तेजित था.. पर मन उत्तेजना के साथ उत्सुक भी था क्योंकि जो अब तक सिर्फ तारा से सुना था और व्यस्क फिल्मों में देखा था, वो सब कुछ मेरी आँखों के सामने था।


अब तक सामूहिक सम्भोग बस जान-पहचान में सुना था.. पर यहाँ तो मेरे लिए एक को छोड़ सभी अजनबी थे। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं था कि किसी अजनबी से मैंने पहली बार सम्भोग किया हो या समूह में पहली बार सम्भोग किया हो.. पर अभी मैं ऐसे माहौल में थी.. जहाँ बस लोग इसलिए मिले थे कि एक-दूसरे के बदन का स्वाद ले सकें। शायद मुझे भी लगने लगा था कि जैसे हर खाने का स्वाद अलग होता है.. वैसे ही अलग-अलग जिस्मों का स्वाद भी अलग होता है।


मैं एक तरफ तो सम्भोग का आनन्द लेना चाह रही थी.. वहीं मेरे मन और मस्तिष्क में दूसरों को सम्भोग रत देखने की भी लालसा भी थी। इधर जो मेरे तन-बदन में खलबली मची थी.. उसके लिए भी मैं बेचैन हुई जा रही थी। मेरे जिस्म के साथ ये पहली बार था कि दो मर्द एक साथ खेल रहे थे।


ये मेरी उत्तेजना को और भी बढ़ा रही थी। पता नहीं मेरे दिमाग में क्या आया.. जैसे कोई बिजली की रफ़्तार से उपाय सा आया और मैं अपने दोस्त को धक्का दे अलग होकर कांतिलाल की तरफ पलट गई और उन पर टूट सी पड़ी।


मैंने उनको धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया और उनके ऊपर चढ़ बैठी। मैं उनके ऊपर झुक कर उनके होंठों से होंठों को लगा कर चूसने लगी और फिर क्या था वे भी मेरे मांसल चूतड़ों मसलते हुए मेरा साथ होंठों से देने लगे।

मुझे उनका तना हुआ लिंग मेरी योनि के इर्द-गिर्द चुभता सा महसूस हो रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था.. जैसे वो मुझे छूते हुए कर अपने अन्दर घुसने के रास्ते की तलाश कर रहा हो।


मेरे दिमाग में तो अब दोहरी नीति शुरू हो गई थी, मैं अब सबको देखना चाहती थी, मैंने अपनी चाल चलनी शुरू कर दी। मैं यह बात तो समझ रही थी कि सभी लोग यहाँ जिस्मों का मजा लेने आए थे.. पर उनके दिमाग में मेरी छवि कुछ और थी.. और मैं वो छवि बरकरार रखना चाहती थी।


बस ये सारी बातें सोचते हुए मैंने अपने बाएँ हाथ से कांतिलाल जी के लिंग को पकड़ा और अपनी कमर ऊपर उठा कर लिंग को अपनी योनि की छेद पर थोड़ा रगड़ दिया।

बस फिर क्या था.. उनका सुपाड़ा तो पहले से लपलपा रहा था। इधर मेरी योनि बुरी तरह गीली होने के कारण सुपारा चिकनाई से और भी गीला हो गया।

मैंने लिंग को थोड़ा सीधा पकड़ते हुए योनि की छेद के तरफ दिशा दी और अपनी कमर को धीरे-धीरे दबाने लगी।

अगले ही पल उनका सुपारा पूरी तरह मेरी योनि के भीतर समा चुका था।


उनका लिंग पूरी तरह सख्त था.. सो मैंने अपना हाथ हटा उनको दोनों हाथों से जकड़ लिया और अपनी कमर लिंग पर दबाती चली गई। कांतिलाल जी का लिंग अब तक आधा घुसा था.. उन्होंने दोनों हाथों से मेरे चूतड़ों को पूरी ताकत से पकड़ा और नीचे से अपनी कमर जोर से उचका दिया।


उनका कड़क लिंग सटाक से मेरी योनि में घुसता हुआ सीधा मेरे बच्चेदानी में लगा। अगले ही पल मेरे मुँह से ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह… ’ की आवाज कराह के साथ निकल पड़ी।


उनका लिंग बहुत ही ज्यादा सख्त था और गरम महसूस हो रहा था। मुझे लगा कि वो जल्दी ही झड़ जाएंगे.. पर मैं उनके साथ पहली बार सम्भोग कर रही थी.. सो कुछ भी अंदाजा लगाना मुश्किल था।


मैं अब सब कुछ भूल कर उनके ऊपर अपनी कमर उचकाने लगी और उनका लिंग मेरी योनि में अन्दर-बाहर होता हुआ मेरी योनि की दीवारों से रगड़ खाने लगा। मैं तो वैसे ही बहुत उत्तेजित थी और उनका भी जोश देख बहुत सुखद आनन्द महसूस कर रही थी। कुछ पलों के धक्कों के बाद कांतिलाल जी ने भी नीचे से पूरा जोर लगाना शुरू कर दिया। हम दोनों की कमर इस प्रकार हिल रही थीं.. जैसे एक-दूसरे से ताल मिला रही हों। इस ताल-मेल में मुझे सच में बहुत मजा आने लगा था।


हम दोनों का हर पल जोश बढ़ता ही जा रहा था और धक्कों की गति तेजी से बढ़ती ही जा रही थी। हमें धक्के लगाते हुए करीब 10 मिनट होने चले थे और हम एक-दूसरे के होंठों को चूमते, चूसते, चूतड़ों को दबाते मसलते, मजा ले रहे थे। वो मेरा एक दूध चूसते और काटते हुए धक्के लगाए जा रहे थे।


मुझे उनका लिंग और उनका जोश वाकयी बहुत मजा दे रहा था। उनके धक्के कभी-कभी मेरी बच्चेदानी में जोर का चोट देते.. जिससे मैं एक मीठे दर्द के साथ कराह लेती और रुक जाती और फिर धक्के लगाने लगती।


मैं इधर मजे में सिसकते हुए कराह रही थी और वो उधर लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए मेरे जिस्म का मजा ले रहे थे। कुछ मिनट के बाद मेरा पूरा बदन गरम हो कर पसीना छोड़ने लगा और मेरे सर, सीने, जांघों के किनारों से पसीना बहने लगा। मेरी योनि पानी-पानी हो चली थी और पानी रिसने सा लगा था.. जो पसीने से मिलकर उनके लिंग को तर कर रहा था। फिर धक्कों के साथ ‘फच.. फच..’ की आवाजें आने लगीं।


मैं अब थकान महसूस करने लगी थी, उनके धक्कों के सामने मेरे धक्के ढीले पड़ने लगे। वो भी काफी अनुभवी थे और जब इस तरह का जोश हो.. तो कोई मौका नहीं छोड़ना नहीं चाहता.. सो उन्होंने सटाक से मुझे बिस्तर पर पलट दिया और मेरे ऊपर से उठ गए।


मुझे तो पूर्ण संतुष्टि चाहिए थी तो मैं उनके यूं उठ जाने से एक पल के लिए बहुत ही झुंझका सी गई.. पर उन्होंने तुरंत तकिया लिया और मुझे कुतिया बन जाने का इशारा किया। मैं भी बिना समय गंवाए पलट कर घुटनों के बल झुक गई और अपने चूतड़ों को उठा दिया।

उन्होंने तकिया मेरे पेट के नीचे लगा दिया और मैं तकिए के सहारे झुक कर कुतिया बन गई।


वो मेरे पीछे घुटनों के बल खड़े हो गए और उन्होंने अपने लिंग को बिना किसी देरी के मेरी योनि में घुसा दिया। अब वो मेरी कमर पकड़ कर जोर-जोर से धक्के लगाने लगे। इस स्थिति में उनके धक्के काफी तेज़ और जोरदार लग रहे थे क्योंकि उनके पास अपनी कमर घुमाने की पूरी आजादी थी।


मैं तो इतनी जोश में थी कि उनका हर धक्का मुझे और भी ज्यादा मजा दे रहा था।


करीब दस मिनट ऐसे ही धक्के लगाने के बाद तो मुझे अँधेरा सा दिखने लगा.. मेरी साँसें तेज़ होने लगीं.. मैं हाँफने और सिसकारने लगी।

अब मैं झड़ने वाली थी.. तभी कांतिलाल जी मेरे ऊपर झुक गए और चूतड़ों को छोड़ मेरे स्तनों को दबोचते हुए धक्के मारने लगे।


दो मिनट के धक्कों के बाद उन्होंने मेरा एक स्तन छोड़ मेरी कमर पकड़ कर अपनी ओर खींची, मैं उनका इशारा समझ गई कि वे मुझे अपनी कूल्हे उठाने को कह रहे हैं.. ताकि मेरी योनि की और गहराई में उनका लिंग जा सके।


मैंने थोड़ा और उठा दिया और वो धक्के लगाने लगे। मेरी तो जैसे जान निकलने जैसी हो रही थी क्योंकि अब मैं झड़ने वाली थी। बस 2-3 मिनट के धक्कों में ही मैंने कराहते हुए.. लम्बी-लम्बी साँसें छोड़ते हुए अपने बदन को ऐंठते हुए पानी छोड़ना शुरू कर दिया।


मैं झड़ते हुए अपने चूतड़ उनके लिंग की तरफ तब तक उठाती रही.. जब तक कि मैं पूरी तरह झड़ न गई।

जब तक मैं सामान्य स्थिति में आती.. कांतिलाल जी धक्के भी लगाते ही रहे। मैं उसी अवस्था में उनके झड़ने का इंतज़ार करती रही। मेरा पूरा बदन ढीला सा पड़ने लगा था.. पर उनके धक्कों की रफ़्तार और ताकत में कोई कमी नहीं थी।


करीब 5 मिनट के धक्कों के बाद उनका लिंग मेरी योनि के भीतर और भी गरम लगने लगा। मैं समझ गई कि अब इनका वक्त आ गया। फिर क्या था.. ‘उम्म्म उम्म्म्म ओह्ह्ह्ह..’ की आवाज करते हुए 8-10 जोरदार धक्कों के साथ उन्होंने मेरी योनि को अपने रस से भर दिया और 1-2 धीमे धक्कों के साथ मेरे ऊपर निढाल होकर हांफने लगे।


कुछ पलों के बाद जब थोड़े शांत हुए तो हम अलग-अलग होकर वहीं बिस्तर पर गिर गए।


मैं अभी सुस्त हुई ही थी कि मेरा वो पुराना मित्र अपने लिंग को हाथों से हिलाता हुआ मेरी ओर बढ़ा। उनका लिंग पूरी तरह तनतनाया हुआ सीधा खड़ा था। मेरे पास आकर उन्होंने झुक कर मेरी टांगों को जांघों के पास से पकड़ कर अपनी और खींचा।


अब वो मेरे साथ सम्भोग करना चाहते थे। जाहिर है इतनी देर मुझे और बाकियों को सम्भोग में लिप्त देख कर उनकी भी उत्सुकता और उत्तेजना काफी बढ़ गई होगी।

तभी मैंने कहा- मैं थक गई हूँ थोड़ा आराम कर लेने दो।


वो मेरी भावनाओं का ख्याल रखते हुए मुस्कुरा दिए और अब वे बबिता और रामावतार जी की तरफ बढ़ गए।

इधर कांतिलाल जी पूरे सुस्त पड़े थे, अब मेरे पास बाकियों को देखने का पूरा मौका था.. तो मैं उठ कर बैठ गई।


मेरे ठीक सामने बबिता, रामावतार जी और रमा जी थे।

वो नजारा सच में बहुत ही उत्तेजक था।


रमा कुर्सी पर हाथ रख कर आगे की ओर झुकी हुई थी और रामावतार जी उसके चूतड़ों को पकड़ कर अपने लिंग को रमा जी की योनि में घुसाए हुए जोर-जोर से प्रहार किए जा रहे थे। वहीं बबिता बार-बार रामावतार जी के पीछे खड़ी होकर उनके बदन को चूम रही थी.. साथ ही वो नीचे हाथ लगा कर उनके अन्डकोषों को भी सहला रही थी।


रमा जी पूरी मस्ती में लग रही थी और रामावतार जी के हर धक्के पर कामुक भरी सिसकारी ले रही थी।


तभी मैंने अपनी बायीं ओर देखा.. कांतिलाल जी के बगल में एक और उत्तेजक नजारा था, शालू नीचे बिस्तर पर लेटी हुई थी और उसकी एक टांग विनोद के कंधे पर थी.. दूसरी टांग को विनोद ने नीचे बिस्तर पर अपनी बाएं हाथ से दबा रखा था। जिससे शालू की दोनों टाँगें फ़ैल गई थीं।


विनोद ने अपनी दोनों टाँगें सीधी कर रखी थीं.. और उसका लिंग शालू की योनि के भीतर था। शालू बहुत ही जोश में लग रही थी। शायद इसी वजह से इस पीड़ादायक अवस्था में भी वो विनोद का साथ दे रही थी, उसने एक हाथ से विनोद का हाथ पकड़ रखा था और दूसरे हाथ से उसके सिर के बालों को पकड़ा हुआ था।


विनोद पूरी ताकत लगा कर शालू को धक्के मार रहा था और शालू मस्ती में कराह रही थी और मजे ले रही थी।


उन दोनों की स्थिति ऐसी थी कि मैं विनोद का लिंग शालू की योनि में अन्दर-बाहर होता देख रही थी। उसकी दोनों टाँगें खुली किताब की तरह फैली हुई थीं और उनके बीच विनोद का लिंग तेज़ी से अन्दर-बाहर होता हुआ दिख रहा था।


विनोद के हर धक्के पर शालू की योनि खुलती बंद सी लगती थी और उसकी योनि के ऊपरी हिस्से पर सफ़ेद झाग सा जम गया था। मुझे यकीन था कि वो पहले एक-दो बार झड़ गई होगी और उसकी योनि ने पानी छोड़ा था.. तभी तो विनोद का लिंग भी चिपचिपा और चमकीला सा दिख रहा था.. जो शालू के योनि से निकले रस की गवाही दे रहा था।

वो दोनों एक दूसरे में घुल से गए थे।


विनोद जोर-जोर से और भयंकर तेज़ी से धक्के मार रहा था, शालू ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह… ’ करते हुए आवाजें निकाल रही थी।

फिर जब विनोद धीमा होता तो शालू उसे बालों से पकड़ कर खींचती और अपने होंठों से होंठ लगा कर चूमने और चूसने लगती।


इस बीच विनोद धीमे-धीमे अपनी कमर को घुमाता और शालू की योनि में लिंग पूरा घुसा कर दबाता जाता। मैं भी इस तरीके से काफी वाकिफ थी क्योंकि इस तरह लिंग का सुपारा बच्चेदानी में बड़े प्यार से रगड़ खाता है और मीठे दर्द के साथ गुदगुदी सा मजा देता है।


फिर मैंने रमा की तरफ ध्यान दिया, रामावतार जी अभी भी उसे पीछे से धक्के मारे जा रहे थे और बबिता उनके पीछे थी।


फिर मेरा वो पुराने मित्र ने बबिता के पीछे जाकर उसके स्तनों को पकड़ा और उसकी गर्दन को चूमने लगा। उसने बबिता को खींचा.. तो वो रामावतार जी से अलग हो गई और पीछे मुड़ कर मेरे मित्र के सामने होकर उसके होंठों से होंठ लगा कर चूमने लगी।


मित्र ने उसे चूमते हुए उसके चूतड़ों को दबोचते हुए इशारा किया और बबिता वहीं नीचे झुक गई। वो घुटनों के बल खड़ी होकर मेरे मित्र का लिंग अपने मुँह में भर कर चूसने लगी.. इससे उनका लिंग और भी तनतना उठा।


बबिता मेरे ख्याल से पहले से गीली थी क्योंकि मेरे सम्भोग से पहले रामावतार जी उसकी योनि को चूस रहे थे।


कुछ मिनट चूसने के बाद बबिता जमीन पर पीठ के बल लेट गई और अपनी टाँगें घुटनों से मोड़ कर अपनी जांघें फैला दीं। इस तरीके से ऐसा लग रहा था जैसे वो मेरे मित्र को आने का न्यौता दे रही हो।


मेरे मित्र तनिक भी देरी किए बिना बबिता के ऊपर ठीक उनकी जांघों के बीच लेट गए, फ़िर अपनी जुबान से दाहिने हाथ में थूक लगा के अपने लिंग के सुपारे पर मलते हुए बबिता के ऊपर झुके ओर लिंग को योनि के छेद पर टिका दिया, बबिता ने भी उनको गले से पकड़ते हुए सहारा दिया।


मेरे मित्र ने धीरे-धीरे अपनी कमर बबिता की योनि के ऊपर दबाया और लिंग धीरे-धीरे योनि में घुसता चला गया। करीब आधा घुसने पर उन्होंने एक जोर का धक्का मारा, बबिता जी के मुँह से ‘आह्ह्ह..’ की आवाज निकली और लिंग बबिता जी की योनि की तह में समा सा गया।

उसके बाद बबिता जी ने एक लम्बी सांस लेते हुए मित्र को अपनी बांहों में जकड़ते हुए अपने ऊपर पूरी तरह गिरा लिया।


अब मेरे मित्र ने भी बबिता जी को उनको बांहों के नीचे से ले जाकर हाथ से उनके कंधों को पकड़ा। बबिता जी ने भी अपनी टांगें थोड़ी और फ़ैला दीं। अब मेरे मित्र ने एक दो-धक्के बबिता की योनि में आराम से मारे और फ़िर लगातार तेज़ धक्कों की बरसात सी शुरू कर दी, बबिता जी मीठी सिसकारियां लेने लगीं।


करीब दो मिनट तक मेरे मित्र के तेज़ धक्के चलते रहे, फ़िर वे थोड़े धीरे हुए और लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए उनके धक्के धीमी गति से चलने लगे थे।


उन्हें देख कर मुझे एक ख्याल सा आने लगा, मेरे दिमाग में लगने लगा कि ऐसा ही सीन होगा जब मैं और मित्र सम्भोग कर रहे होंगे। इस बात को सोचते हुए मैं मन ही मन में मुस्कुराने लगी।

शायद किसी ने अगर हमें सम्भोग करते देखा होता तो यही कहता कि बिल्कुल हमारी तरह का नजारा दोबारा चल रहा है।


तभी अमृता कहीं से आईं, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वो अब तक कहाँ थीं।


उन्होंने आते ही मेरे बगल में लेटे कान्तिलाल जी को उठाया और बोलीं- क्या इतने में ही दम निकल गया?

इस पर कान्तिलाल जी ने जवाब दिया- अभी तो आपका दम निकालना है.. अभी मुझ में बहुत दम बाकी है।

अमृता ने उन्हें जवाब देते हुए कहा- चलो देखते हैं.. कौन किसका दम निकालता है।


यह कहते हुए वो उनसे लिपट गईं, वो वहीं बिस्तर पर उनके ऊपर गिर गईं और उन्हें चूमने लगीं। उनके बगल में शालू और विनोद अपनी अपनी चरम सीमा को पाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे। विनोद जिस ताकत और जोश से शालू को धक्के मार रहा था.. उससे तो यही ज्ञात हो रहा था।


थोड़ी ही देर में शालू का बदन कांपने सा लगा और वो विनोद की छाती को मसलते हुए अपनी कमर दबा कर गोल-गोल घुमाने के साथ लम्बी-लम्बी साँसें लेती हुई ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ करने लगी, मैं समझ गई कि शालू झड़ गई।


शालू के शांत होते ही विनोद ने उसे अपने ऊपर से हटाया और उसे बिस्तर पर गिरा दिया और खुद घुटनों के बल होकर अपना लिंग शालू के मुँह में डाल दिया।


शालू विनोद के लिंग को अपने हाथ से हिलाते हुए अपने मुँह से चूसने लगी। थोड़ी देर लिंग चूसने के बाद विनोद ने अपना लिंग उसके मुँह से खींच लिया और शालू के स्तनों के ऊपर अपने हाथ से जोरों से हिलाने लगी।


तभी अचानक अमृता ने कान्तिलाल जी को चूमना छोड़ कर विनोद का लिंग पकड़ लिया और उसे हिलाने लगी। विनोद ने अपनी आँखें बंद कर लीं और सिर ऊपर उठा अपने पूरे बदन को एकदम से सख्त कर लिया। अमृता ने पूरी तेजी से उसका लिंग हिलाना जारी रखा और अब विनोद ‘हुम्म्म.. अह्ह्ह्ह..’ करने लगा।


तभी विनोद ने एक हाथ से अमृता के हाथ को पकड़ा और उसे और तेज़ गति दे दी। साथ ही विनोद ने दूसरे हाथ से शालू के बालों को जोर से पकड़ा.. और बस एक और जोर लगा कर विनोद के लिंग से तेज़ धार निकल पड़ी, उसके लिंग का सफ़ेद गाढ़ा वीर्य शालू के दोनों स्तनों पर फ़ैल गया।


विनोद झड़ते हुए धीरे-धीरे कमजोर सा पड़ता हुआ झुकता चला गया। उसका माल टपकता रहा.. जब तक कि उसके लिंग से आखिरी बूंद अमृता ने ना निकाल दी।


विनोद के झड़ते ही अमृता ने उसे छोड़ दिया और वो शालू के बगल गिर कर सुसताने लगा। अमृता फ़िर से कान्तिलाल जी के साथ व्यस्त हो गई।


उधर बबिता के साथ मेरे मित्र और रमा के साथ रामावतार जी पूरे वेग से जोर लगाए जा रहे थे। बबिता और रमा जी की गीली योनियां दोनों के लिंगों को आसानी से अन्दर-बाहर होने में बहुत मदद कर रही थीं, दोनों के जोड़ों के धक्कों में ‘थप-थप’ की आवाजें आने लगी थीं।


बबिता और रमा जी की कराहें और सिसकारियां गवाही दे रही थीं कि वो दोनों कितने में मजे में हैं। वहीं उन दोनों मर्दों के धक्कों की रफ़्तार और उनके हाँफ़ने की दशा बता रही थी कि दोनों कितने जोश में हैं, दोनों बिना रुके जोर-जोर से धक्के मार रहे थे।


सच में उन्हें देख कर तो अब मेरा भी मन उत्तेजित होने लगा था। तभी रामावतार जी के झटके 3-4 धक्कों के साथ धीमे पड़े और उन्होंने रमा जी के स्तनों को दबाते हुए उनके चेहरे को अपनी तरफ़ खींच लिया और वे रमा जी को चूमने लगे।


रमा जी ने भी अपने हाथ पीछे कर रामावतार जी के चूतड़ों को पकड़ कर अपने चूतड़ों पर दबाती हुई उन्हें चूमती हुई अपनी कमर को इस अन्दाज में घुमा रही थीं.. जैसे वो और भी धक्कों के लगने का इन्तजार कर रही हैं।


मुझे दूर से ऐसा लग रहा था जैसे रामावतार जी का लिंग रमा जी के बड़े और मांसल चूतड़ों के बीच फंस गया हो। उन्होंने कुछ पल तो यूँ ही प्यार किया फ़िर वो अलग हो गए। मुझे लगा कि वो दोनों अपनी अवस्था बदलना चाह रहे हों।


रमा जी ने नीचे लेटी हुई सम्भोग में लीन बबिता को झुक कर कहा- बस भी करो बबिता जी.. क्या पूरा मजा अकेले ही ले लोगी?

तभी बबिता और मेरे मित्र जैसे नींद से जागे हों.. वे दोनों एक-दूसरे से अलग होते हुए उठे।


बबिता जी ने जवाब दिया- अकेले मजा लेने सब थोड़े इकट्ठे हुए हैं.. आ जाओ तुम भी इस तगड़े लंड का मजे ले लो।

रमा ने जवाब दिया- ऐसा नहीं है बबिता यहाँ सबके लंड तगड़े हैं, बस मजे लेने के तरीके होने चाहिए।

तभी रामावतार जी ने कहा- आ जाओ बबिता.. मेरे लंड को भी अपनी चूत का पानी चखा दो।


उनके कहने की देरी थी कि बबिता जी मेरे मित्र से अलग हुई और खड़ी हो गईं।


रामावतार जी ने उनके खड़े होते ही उन्हें कमर से जकड़ते हुए उठा लिया। अब रामावतार जी ने बबिता जी को वहीं मेज पर बिठा दिया और चूमने लगे।


वे दोनों एक-दूसरे को चूमते हुए सम्भोग की स्थिति बनाने लगे।


रामावतार जी खड़े थे और बबिता मेज पर बैठी थीं और दोनों एक-दूसरे को चूमते हुए सम्भोग का आसन बनाने लगे। धीरे-धीरे बबिता जी अपनी जांघें फ़ैलाती गईं और रामावतार जी उनके बीच आते गए। अब उन दोनों के लिंग और योनि आपस में छूने लगे थे.. पर अभी शायद रामावतार जी अपना लिंग घुसाना नहीं चाहते थे.. सो वे उसी स्थिति में चूमते-चूसते मजे लेने लगे।


उधर रमा जी ने मेरे मित्र को नीचे लिटा दिया और उनके बगल में बैठ कर उनके लिंग को पहले तो कपड़े से साफ़ किया.. फिर मुँह में लेकर चूसने लगीं। मेरे मित्र भी उनके स्तनों को दबाते हुए स्तनपान करने लगे।


मुझे उन्हें यूं स्तन चूसते देख कर सच में बहुत मजा आ रहा था।

मैं धीरे-धीरे फ़िर से उत्तेजित हो रही थी और मेरा हाथ खुद मेरी योनि की तरफ़ चला गया।


थोड़ी देर के बाद रमा ने मित्र को सीधा लिटा दिया और उनके मुँह के ऊपर दोनों टांगें फ़ैला कर बैठ गईं। मैंने सोचा ये क्या कर रही हैं.. तभी समझ में आया कि वो अपनी योनि चटवाने के लिए ऐसा कर रही थीं। मेरे मित्र भी बड़े चाव से रमा जी की योनि को चाटने लगे।


उधर रामावतार जी ने बबिता जी को मेज पर लिटा दिया और उनकी दोनों टाँगों को अपने कंधों पर चढ़ा लिया। उनकी स्थिति 90 डिग्री के कोण में थी। तभी रामावतार जी ने अपने मुँह से गाढ़ा थूक निकाला और उसे बबिता की योनि की दरार गिरा दिया। बबिता ने उनका लिंग पकड़ा और लिंग के सुपारे को थूक में सानते हुए अपनी योनि को मलने लगीं और फिर लिंग के सुपारे को अपनी योनि में घुसा लिया।


अब लिंग घुसने को तैयार दिख रहा था तो बबिता जी ने लिंग को सही दिशा दिखा कर अन्दर घुस जाने के लिए अपने हाथों को सिर की तरफ़ ऊपर उठा मेज को पकड़ते हुए जोर लगाया।


बबिता के सही स्थिति में होते ही रामावतार जी ने उनकी जाँघों को कस के पकड़ा और जोरों से अपनी कमर को बबिता की तरफ़ धक्का दे दिया। इस धक्के के साथ ही उनका लिंग बबिता की योनि के भीतर समाता चला गया।


लिंग के योनि में पेवस्त होते ही बबिता जी ने उसी वक्त एक लम्बी सांस लेते हुए अपनी कमर उठा दी। इस क्रिया से करीब आधा लिंग बबिता जी की योनि के अन्दर चला गया था।


अब रामावतार जी ने दोबारा से अपने लिंग को बाहर खींचा और एक और जोरदार धक्का मार दिया। इस बार तो बबिता जी की चीख सी निकल गई। बबिता जब तक शांत होतीं.. रामावतार जी ने फ़िर से अपना आधा लिंग बाहर निकाल कर दोबारा धक्का दे मारा। उसके बाद तो तेज़ और जोरदार धक्के शुरू हो गए और बबिता चीखते और सिसकी लेते हुए मजे में कमर उचका कर रामावतार जी के लिंग का जवाब अपनी योनि के झटकों से देने लगीं।


उधर रमा जी की योनि भी बुरी तरह तैयार हो चुकी थी और उनके स्तन के चूचुक सख्त होकर खड़े हो गए थे।


मेरे मित्र का भी लिंग भी जोर मार रहा था.. वो बार-बार घड़ी की सुई की तरह तन रहा था और योनि में घुसने को ललचा रहा था। रमा के मोटे चूतड़ योनि चटवाते समय जिस तरह घूम रहे थे उससे मुझे भी इस बात की लालसा हो रही थी कि जब वो मेरे मित्र के लिंग के ऊपर चढ़ाई करेंगी.. तो कैसा लगेगा।


हुआ भी वैसा ही.. रमा जी में मेरे मित्र के मुँह से अपने चूतड़ों को हटाया और उनकी कमर के पास अपनी कमर को भिड़ाते हुए अपनी दोनों टांगें फ़ैला कर उनके ऊपर चढ़ गईं, अभी लिंग रमा जी की योनि के बाहर ही था तो उन्होंने हाथ नीचे ले जाकर मेरे मित्र का लिंग पकड़ कर अपनी योनि की छेद पर टिका दिया, फिर दोनों हाथों से मेरे मित्र को पकड़ा और बहुत ही कामुक अन्दाज में अपने चूतड़ों को लिंग पर दबाने लगीं, लिंग कुछ ही पलों में योनि के भीतर समा गया और अब रमा जी के विशाल चूतड़ों के नीचे सिर्फ़ अंडकोष ही बाहर योनि का पहरा देते हुए दिख रहे थे।


जैसे ही मेरे मित्र का सख्त लिंग रमा जी की योनि में घुसा.. मित्र को जरूर सुकून मिला होगा.. तभी उन्होंने भी बहुत ही जोर से रमा के चूतड़ों को दबाते हुए नीचे से अपनी कमर उठाना आरम्भ कर दिया था। रमा जी ने फ़िर से तभी अपने चूतड़ों को थोड़ा उठाया.. जिससे मेरे मित्र भी अगले धक्के के लिए तैयार हो गए।


फ़िर क्या था.. जैसे ही रमा ने धक्का ऊपर से लगाया.. उन्हें भी नीचे से एक धक्का लगा। अब दोनों ही काफ़ी गरम जोशी में दिख रहे थे। थोड़ी ही देर में दोनों ने ताल से ताल मिलाना शुरू कर दिया। रमा जी जैसे-जैसे ऊपर से धक्के मारतीं वैसे-वैसे नीचे से मेरे मित्र अपनी कमर उचका कर उनके धक्के का जवाब देते।

दोनों ही बड़ी गर्मजोशी से एक-दूसरे में खोने लगे थे, दोनों धक्कों के साथ एक-दूसरे को कभी चूमते तो कभी काटते जा रहे थे, कभी रमा अपने होंठों का रस चुसातीं.. तो कभी अपने स्तनों से दूध पिलातीं। हालांकि रमा जी के स्तनों में दूध नहीं आता था.. पर फ़िर भी वो दोनों जोश में ऐसी हरकतें कर रहे थे।


उधर बबिता जी ऐसे सिसकियां ले रही थीं.. जैसे उनकी जान निकलने वाली है। रामावतार जी भी पूरे जोरों से हाँफ़-हाँफ़ कर धक्के मार रहे थे। उन दोनों की मादक सिसकारियां निकल रही थीं। लिंग और योनि के मिलन से ‘थप-थप’ और ‘चप-चप’ की आवाजें निकल रही थीं।


यही हाल रमा और मेरे मित्र के सम्भोग का था। इधर मैं उन्हें देख कर गर्म होने लगी थी और उधर कान्तिलाल जी को अमृता फ़िर से गर्म कर रही थीं।


विनोद और शालू थोड़े सामान्य हुए। शालू उठ कर बबिता और रामावतार जी के पास चली गई और रामावतार के गाल पर चुम्बन देते हुए शालू बबिता जी के स्तन को सहलाते हुए बोली- हाय कितनी बेरहमी से चोद रहे हो, कुछ तो रहम करो।


रामावतार जी ने भी धक्के लगाते हुए कहा- इसके बाद तुम्हारी बारी है जानेमन।

इसके जवाब में शालू हँसती हुई बोली- पेशाब करके आती हूँ, मेरे आने से पहले मत झड़ जाना।


ये कहते हुए शालू चली गई और रामावतार जी बबिता की योनि में धक्के मारते रहे।


बबिता जी की सिसकारियों ने और जोर पकड़ना शुरू कर दिया था.. अब वो झड़ने के करीब आ गई थीं। उनकी चरम पर आने की हरकतें रामावतार जी को और उकसाने लगी थीं।


कुछ ही पलों में बबिता जी की योनि से रस की धारा तेज़ी से निकलने लगी थी जो रामावतार जी के अन्डकोषों से लग कर बून्द-बून्द टपकने लगी थी। वे दोनों पसीने-पसीने हो चुके थे और बबिता जी का पानी उनके चूतड़ों के बीच के घाट.. और रामावतार जी के अन्डकोषों और जाँघों से बहने लगा था।


तभी बबिता जी ने एक झटके में मेज छोड़ रामावतार जी के हाथों को कस कर पकड़ लिया। बबिता जी जोर-जोर से साँसें लेने लगीं और हाँफ़ते हुए बड़बड़ाने लगीं।


‘ह्म्म्म्म.. अह्ह्ह्ह.. ओह्ह्ह्ह औऊउर.. तेज़.. और जोर से मारो.. ऊपर ऊपर.. की तरफ़ लंड मारो.. हाँ.. आह्ह.. उम्म्ह… अहह… हय… याह… मेरी बच्चेदानी तक पेलो.. रुको मत.. चोदते रहो..’


ये सारी बातें किसी मर्द को उकसाने के लिए बहुत होती हैं.. और यही हुआ भी। रामावतार जी ने बबिता के चूतड़ों को पकड़ते हुए उन्हें थोड़ा ऊपर को उठाया और इतनी तेज़ी से धक्का मारने लगे जैसे उनकी मर्दानगी को किसी ने चुनौती दे दी हो।


बबिता जी और जोरों से बड़बड़ाने लगीं ‘आह्ह.. और तेज़ी से चोदो मुझे.. और तेज़ और तेज़.. आह्ह्ह्ह्ह म्म्म्म्म ऊऊ.. मां..’


तभी अचानक बबिता जी उठ बैठीं और रामावतार जी के गले में हाथ डाल कर खुद को उनसे चिपका लिया.. साथ ही अपनी जाँघों से उनको जकड़ लिया।


रामावतार जी ने भी उन्हें सहारा दिया, पर धक्कों की न तो तेजी में.. न ही जोर में कोई कमी आने दी।


बबिता जी अपनी कमर को घुमाने लगीं और ‘ह्म्म्म.. ह्म्म्म.. आह्ह्ह.. आह्ह्ह..’ करते हुए झड़ने लगीं।


अभी बबिता जी शान्त होतीं.. उससे पहले ही रामावतार जी भी पूरी ताकत झोंकते हुए उनकी योनि में अपना तपता हुआ लावा उगलने लगे। वे दोनों एक-दूसरे से चिपके हुए थे.. बस दोनों की कमर हिल रही थीं। फ़िर धीरे-धीरे उनका भी हिलना शान्त हो गया। अब दोनों झड़ चुके थे.. पर अब भी साथ में चिपक कर लगे हुए थे।


तभी शालू आई और रामावतार जी के चूतड़ पर थपकी देती हुए बोली- मेरे आने से पहले ही झड़ गए?


रामावतार जी ने अलग होते हुए जवाब दिया- अभी तो काफ़ी समय है.. दोबारा तुम्हारे लिए भी तैयार हो जाऊँगा बेबी।


बबिता जी की आँखें संतुष्टि से भरी हुई दिख रही थीं। उन्होंने शालू से मुस्कुराते हुए कपड़ा माँगा और अपनी योनि साफ़ करने लगीं।

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